Thursday, February 26, 2026

बिना पानी, बिना जहर के होने वाली गुरु नानक खेती अथवा प्राकृतिक पारिस्थितिकीये खेती,-Psradoxial krishi by Dr Vinod Chaudhary.

इस खेती के निम्नलिखित तीनसद्धांत हैं:-
1,Breaking of hard core layer of soil of nearly 7 inches to 25 inches made due to use of  tractor,use of chemical fertilizers and pesticides which  prevents the entry of water in soil.It is done with the help of subsoiler.
2,Flood irrigation  and make ridges and furrows . Growcrops on beds .Mulching on beds with crops like Gowar .
3,Irrigate the crops in furrows.
4Principles of this Farming :-
   -किसी भी पौधे के विकास के लिए पानी नहीं चाहिए बल्कि नमी चाहिए ।
   -  नमी  नालियों में देना है ।
     -जमीन को सनलाइट भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे कार्बन Co2 बनकर उड़ता है। इसलिए ज्यादा जुताई भी नहीं चाहिए।
      -यूरिया जैसे रसायन ऑन तथा विभिन्न प्रकार के रसायनिक  कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से मनुष्य म   नशा की प्रवृत्ति उभरने लगती है। गेहूं और धन यह हमारा भोजन नहीं है यह सिरों तथा पक्षियों का भोजन है।
    -सिंचाई सिर्फ नालियों में करनी चाहिए जिससे नालियों की नमी बर्ड्स पर पहुंच जाएगी जो पौधों के विकास में सहायता करती है। 
      -करीब 138 फसलों में से हम सिर्फ चार फसलों तक सीमित रह गए हैं जिनके लिए पानी बर्बाद होता है ।
       -मल्चर से मल्चिंग काटकर बेड पर गिरादते हैं।
       -   खरपतवारऑन को भी मल्चिंग के काम में लाते हैं।  
       -किस प्रकार की खेती के लिए एक छोटा ट्रैक्टर चाहिए। 
         -, इस प्रकार की खेती में जमीन में सूक्ष्म जीवाणु तथा पानी की बचत होती है। 
         ,-इस प्रकार की खेती में   फसल हमेशा उत्तर दक्षिण की दिशा में लगाते हैं।   
       -खेती से संबंधित या खेती से जुड़े हुए अन्य बिजनेस को भी बढ़ाया जा सकता है।  
        -इस प्रकार की खेती से ग्लोबल वार्मिंग तथा क्लाइमेट चेंज के प्रभाव से भी बचा जा सकता है।

Sunday, February 22, 2026

जीरो बजट प्राकृतिक खेती-श्री सुभाष पालेकर जी की विचारधारा

जीरो बजट आध्यात्मिक खेती वह प्रणाली है जिसमें मुख्य फसल की लगत का मूल्य अंतर फसलों अथवा इंटरक्रॉपिंग की फसलों से निकलते हैं तथा मुख्य फसल  की उपज को मुनाफे तौर पर लिया जlता है और इसमें बाजार से कोई भी इनपुट नहीं खरीदा जाता है । इनपुट्स अपने घर से प्रयोग करना पड़ता है । इस प्रकार की खेती में मल्टीकपिंग, मल्टीलयर क्रॉपिंग को बढ़ावा दिया  जाता है तथा जुताई, नीलाई तथा किसी भी खाद का इस्तेमाल बाहर से नहीं किया जाता है। यह खेती सहजीवन के सिद्धांतों पर कार्य करती है । उदाहरण के तौर पर गाने के साथ विभिन्नपकार की फसलें जैसे अरहर, मूंग, हल्दी, आदि फसलें  लगाते  हैं । इसमें गणना 8 फीट की दूरी पर लगाते  है ।
     आध्यात्मिक खेती का मतलब  फसलों की वृद्धि एवं इच्छित उपज  के लिए सारे ससाधन अथवा इनपुट की आपूर्ति केवल प्रकृति करती है।

Saturday, February 21, 2026

आईपीएम संदेश

हमने प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल ,जमीन, जंगल, जानवर या बायोडायवर्सिटी तथा जीवन के पंचमहाभूत क्षति, जल, पावक ,गगन, समीरा, का दोहन जितना कर सकते थे उतना कर लिया है। जमीन बंजर हो चुकी है तथा जैव विविधता नष्ट हो चुकी है , जमीन की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो रही है। हम कोई अंतिम पीढ़ी के व्यक्ति नहीं हैं। अगर प्राकृतिक संसाधन इसी तरह से खत्म होते रहे तो आने वली पीढ़ियों को रोटी,पानी तथा ऑक्सीजन की भीख मांगनी पड़ेगी। पैसा कोई माने नहीं रखेगा । कागज का नोट तो छापा जा सकता है परंतु पानी ,खाना , ऑक्सीजन नहीं छापी जा सकती । प्राकृतिक संसाधन हमारे माई बाप  है जो हमारे जीवन को सुरक्षित एवं संचालित रखते हैं । अतः जीवन को बरकरार रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ना करें। और कृषि तथा अन्य विकास को विनाशकारी ना बनाया जाए तथा कृषि एवं अन्य टेक्नोलॉजी को कृषक, प्रकृति और जीवन हितैषी बनाया जाएं जिससे सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। सामुदायिक स्वास्थ्य, फसल पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता , पर्यावरण, जीवन, प्रकृति ,किसान एवं समाज की सुरक्षा हेतु आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती अपनाएं । भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाएं तथा प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण करें। इसके लिए वैज्ञानिकों, बुद्ध जीवियों, तथा विकसित कृषकों के द्वारा विकसित की गई विभिन्न प्रकार  की कृषि उत्पादन प्रणालियों तथा विचारधाराओं से चयन करके एक प्रकृति व समाज हितैषी समेकित एवं हर प्रकार से लाभकारी विधि को विकसित किया जए ।

टिकाऊ कृषि अथवा सस्टेनेबल एग्रीकल्चर

यह एक ऐसीकषि पद्धति है जो पर्यावरण संरक्षण, अधिक लाभ, और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बनती है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे मिट्टी, पानी, बयोडायवर्सिटी, ह्यूमस और जीवांश कार्बन को नुकसान पहुंच चाय बिना कम लागत और स्थानीय संसाधनों के उपयोग से भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भोजन का उत्पादन करना है । इस खेती मैं रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद या फसल चक्र, एकीकृत नासि जीवपबंधन, एकीकृत पोषण तत्वों का प्रबंधन पर जोर दिया जाता है और किसानों की आय बढ़ाने में प्राथमिकता दी जाती है। इस खेती में प्रयोग किए  जाने वाली गतिविधियां निम्नलिखित हैं ।
1,Allied agribusiness 
2,To reduce the cost of cultivation.
3,Integrated Pest Management ,(IPM).
4,Water Management.
5,Crop rotation 
 6,  Soil health.
7, Balance use of fertilizers.
8,Integrated Nutrients Management.
9., Integrated disease Management.
10,Integrated weed management.