Thursday, April 23, 2026

IPM in terms of the farmers. किसानों के विचार से आईपीएम क्या है?

विभिन्न प्रकार की संस्थाओं, वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवीयो, तथा प्रगतिशील किसानों,ने  आई पी,एम   की विभिन्न पकार की परिभाषाएं दी हैं ।यहां तक मैंने भी आई पी एम की 20-25 परिभाषाएं दी है। परंतु जैसा कि मैंने पहले बताया की आईपीएम जीवन के प्रत्येक मुद्दे से संबंधित खेती करने की तथा वनस्पति संरक्षण करने की एक विचारधारा  है। आई पी एम  नासिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति कै समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है । आई पी एम जहां  एक तरफ किसानों की जीविका  संचालन से  जुड़ी हुई है वहीं यह अन्य सभी लोगों तथा पशुओं  ,सूक्ष्म जीवों, पक्षियों  आदि की खाद्यसुरक्षा को भी सुनिश्चित करने  में अपना महत्व पूर्ण योगदान देती है। खाने के योग्य सुरक्षित कृषि उत्पादों का कम से कम  खर्चे में अधिक से अधिक उत्पादन,और उनका बाजार से अधिक से अधिक विक्रय मूल्य प्राप्त करना किसानों का खेती करने का मुख्य उद्देश्य होता है। इसके लिए किसान भाई विभिन्न प्रकार की विधियों। प्रयोग करते हैं जिसमें रासायनिक विधियां भी शामिल होती हैं।परंतु खाने के योग्य सुरक्षित भोजन के उत्पादन के लिए 
रासायनिक विधियों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप मैं  किसी आपातकालीन परिस्थिति के निदानहेतु हो किया जाता है।।कृषि उत्पादों का उत्पादन भूमि की उर्वरा शक्ति एवं जमीन मै  पे जानेवाले जीवांश कार्बन , सूक्ष्मजीवों जीवों,एवं उनसे निर्मित   ह्यूमस से होती है अथवा निर्भर करती है। अतः जीवांश कार्बन   की अधिकता बनाए रखने के लिए जमीन मैं कार्बनिक पदार्थ जैसे जानवरों का मल मूत्र , पौधों तथा फसलों के अवशेषों को तथा जमीन मैं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाने के लिए जीवामृत  तथा घन जीवामृत  को जमीन मैं फसलों की बुवाई से पूर्व पलेवा के समय खेतों में डालते हैं। खेतों के चारों तरफ मेड बनाते हैं तथा मेड पर विभिन्न प्रकार के पेड़ भी लगते हैं जाेबचिडियों के बैठकों का  काम करते हैं तथा विभिन्न प्रकार के नशीजीवों का प्रबंधन करते हैं। मेडेन एक खेत  का जीवांश कार्बन , मिट्टी और पानी दूसरे खेत मैं रोकने के लिए सहायक होती हैं। खरपतवारों की  ऊंचाई अगर फसल से ऊपर होजनेवपर उनको वहीं खेत में ही दबा देना चाहिय।
आजकल का आईपीएम / खेती बाजार  तथा रसायनों पर आधारित है यद्यपि यह आईपीएम केसद्धांतों के विपरीत है। खेती के सारे इनपुट बाजारों से खरीदे जाते हैं जिससे उत्पादन की कीमत  बढ़ जाती है । कृषि उत्पादन की कीमत
को कम करना खेती का प्रमुख कार्य  है । इसके लिए खेती के इनपुट्स को बाजारों से ना खरीदा जए बअली किसानों के घर  पर ही बनाएंगे। जिससे किसानों की कृषि उत्पादों की लागत कम होगी तथा किसानों आमदनी बढ़ेगी। कृषि उत्पादों के उत्पादन के अलावा उनकी पैकेजिंग ,वैल्यूएडशन, प्रमाणीकरण,तथा विपणन संबंधी गति विधियों को भी आई पी एम मैं शामिल करना चाहिए़।
IPM is the Sangam / merger  or Triveni   of three rivers or schemes of Dte. Of Plant Protection, Quarantine and Storage commenced from 1991-92., These are Biological control,or Ganga ,Pest Surveillance ,or Yamuna and  Plant Protection or Sataswati in which now Plant Protection / Sarswati is  invisible. This  Triveni  is  .spreading or dissiminating   the messege of IPM  among its all stakeholders  to grow / protect the plants / Crops  and Agricultural commodities / crops  with minimum expenditure, minimum use of  chemicals or  without use of chemicals and with least disurbance to life,nature  Environment and society through adoption of all available, affordable and feasible methods of pest management in compatible manners  to suppress the pest population below ETL..
I will remain obliged of IPM Scheme for providing bread and butter to  me as wellas to my children  throughout my life. Now according to my own idea IPM has now become the ithought of the integration of   all the schemes of Dte Of P,PQ and S with a concept  or theme of ensuring food Security along with food safety, environment and ecological 

Monday, April 20, 2026

प्लांट प्रोटेक्शन (पादप संरक्षणकृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत फसलों को कीटों, बीमारियों, खरपतवारों और हानिकारक जीवों से बचाकर उनकी उत्पादकता और गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जाता है। इसका उद्देश्य फसलों को नुकसान से बचाना और पैदावार बढ़ाना है, जिसके लिए यांत्रिक, रासायनिक, जैविक और कृषि पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
प्लांट प्रोटेक्शन के मुख्य पहलू:

Sunday, April 19, 2026

प्राकृतिक खेती- डॉ वी ,के सचान

आज की खेती अथवा  रासायनिक खेती  में निवेश बहुत लगता है। किसान पहले महंगे से महंगे बीज खरीदते हैं जिसमें बहु अधिक पैसा लगता है। जबकि बीज पहले  अपने घरों में ही किसान बनाते थे । इसके अतिरिक्त विभिन्नपकार के रसायनों जैसे उर्वरक, कीटनाशक, फफूंदी नाशक, खरपतवार नाशक, विभिन्न प्रकार के ग्रोथ प्रमोटर्स, को उच्च दामों पर बाजार से खरीदे जाते हैं जिससे किसानों का अधिकांश पैसा लागत के रूप मे लग जाता है । इसी प्रकार से ट्रैक्टरों के द्वारा जुटाई, ट्यूबवेल से पानी तथा बिजली का बिल, विभिन्न परकार की कल्चरल क्रियाओं को जब मजदूरों के द्वारा कराया जाता है तो उसमें बहुत सारा खर्च होता है। अर्थात जो पैसा हमें अपने घर पर होना चाहिए़ वो  बाजार मैं देना पड़ता है। इस प्रकार से किसानों की कुल आय में काफी कमी आ जाती हैं।
धरती की उर्वरता शक्ति ,धरती में जीवाश्म कार्बन तथा ह्यूमंस की मात्रा कम  हो  जाने से  धरती  की उर्वरा शक्ति बहुत ही कम हो गई है । अतः हमें धरती मैं  हमास की 

 मात्रा तथा सूक्ष्म जीवाणु कि संख्या बढ़ाना पड़ेगा जिससे जमीन  की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो सके। जमीन की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करना आज की परम आवश्यकता है ।
जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाने के लिए पशुओं के मल मूत्र तथा   फसलों के अवशेष तथा हरी खाद्य  का प्रयोग करना चाहिए़।तथा सूक्ष्म जीवाणुओ की संख्या में बढ़ाने के लिए जीवामृत, धनजीव अमृत आदि को प्रयोग  के  साथ जब खेत मैं  पर्याप्त नमी हो फसल बो ने से पहले पलेवा के साथ प्रयोग   करना चाहिए़।
जमीन मै से जीवांश कार्बन को दूसरे खेत मैं  जाने रोकने के लिय खेतों के चारों तरफ मेड बनाना चाहिए    तथा मीडो पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वृक्ष लगाने चाहिए जिनको पक्षी बैठकों के रूप में प्रयोग कर सकें।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार या उसमें कुछ सुधार करके जब खेती की जाती है तब उसे प्राकृतिक खेती कहते हैं। प्राकृतिक खेती एक विचार है। यह एक जीवन शैली है ।
जब हमारा विचार प्रकृतिमय  हो जाएगा। तभी हम प्राकृतिक खेती कर सकते हैं ।
जब हमें प्रकृति, और उसके संसाधनों तथा जैव विविधता, पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदना,सम्मान,एवं दर्द महसूस होगा और अंदर से यह भी महसूस होगा कि कहीं  रसयनो के दुसप्रभावों  के शिकार कहीं हम या हमारे परिवारजन न हो जाएं  तब ही हमारे मन मैं प्राकृतिक खेती के प्रति रुझान पैदा होगा और हम प्राकृतिक खेती कने के लिय आगे बढ़ सकें ge। 
प्राकृतिक खेती का उद्देश्य सर्वे भवंतु सuखना  , सर्वेश संतु निरामया अर्थात इस ब्रह्मांड मेंपाए जानेवाले  सभी जीव   सुखी तथा निरोगी हो। प्रकृति को बर्बाद ना करें। हम इस प्रकार से खेती करें कि जमीन की उर्वर शक्ति,जैव विविधता,जल,जंगल, जानवर,जलवायु, और जन  पर कोई  विपरीत प्रभाव ना पड़े इसी को हम प्राकृतिक खेती कहते हैं। जमीन मैं जैविक   कार्बन की मात्रा को इस समय 0,3  है वह 1,0 तक पहुंच जाय । जमीन मैं तो जीवांश कार्बन को  बढ़ाना ही पड़ेगा। पानी है जिंदगानी इसके बगैर बेकार है जिंदगी की कहानी ।पानी को तो बचाना ही पड़ेगा। गाय आधारित खेती की जगह हमें  बैंल पर आधारित खेती करनी ही पड़ेगी और इनका गोबर खेत में डालने पड़ेगा तभी प्राकृतिक खेती हो सकेगी। How to save soil fertility is the main Mantra of prakritik kheti. यह धन कमाने का वक्त नहीं है यह जान बचाने का समय है।

Friday, April 17, 2026

Acharya दev brat - His thoughts about prakritik kheti.

Difference between ween Organic  kheti and Prakritic kheti.
1, जैविक   खेती में ना खर्चा कम होता है ,न उत्पादन बढ़ता है और ना ही परिश्रम कम   होता  है । इस खेती मैं भी इनपुट्स  बाज़ार ही खरीदे जाते हैं जो रासायनिक इनपुट से भी  महंगे होते  हैं ।
2, ऑर्गेनिक खेती के प्रमुख तीन प्रकार के इनपुट्स होते हैं ।
ये हैं ,1, कंपोस्द खाद ''2, वर्मीकपोस्ट खाद ,,3,, बायो डायनॉमिक्स अर्थात जानवरों के सींगों की खाद ।
इन तीनों प्रकार के इनपुट एस का प्रयोग करना साधारण तौर पर किसानों के लिए असंभव है तथा महंगा है।
3, केंचुआ के खाद मैं विभिन्न प्रकार के हैवीमेटल पाए जाते हैं  जो हमारे शरीर में जा करके तरह-तरह की बीमारियां पैदा  करते हैं। गोबर की  खाद वातावरण का टेंपरेचर जब 40 डिग्री से ऊपर होता है तो कार्बन तथा ऑक्सीजन से रिएक्ट करके कार्बन मोनोऑक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसे उत्पन्न करते हैं जो ग्रीनहाउस गैसेस है जींस वातावरण का टेंपरेचर बढ़ता है इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। 
प्राकृतिक खेती 
1, यह खेती प्रकृति तथा जंगल के सिद्धांतऑन  पर आधारित है। प्रकृति जब जंगल के सभी पेड़ पौधों की भरपूर पूर्ति करती है तो हमारे खेतों  की फसलों   की भी पूर्ति करेगी।
2 प्राकृतिक खेत भूमि मेंपाए जाने  वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों पर आधारित खेती है। जो पतझड़ होने के  बाद  नमी की उपस्थिति में पौधों के  पत्तों को सदा कर ऑर्गेनिक कार्बन में बदलते हैं जो बाद  में   ह्यूमस मैं बदल जाता है।ह्यूमस ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से सूक्ष्म जीव खत्मह चुके हैं । अत इनकीसख्या को जमीन मैं बढ़ाना  अति आवश्यक है। इसके लिए जमीन में कार्बनिक पदार्थ जैसे जानवरों का मल मूत्र पौधों व फसलों के अवशेष तथा जीवामृत का प्रयोग उसे वक्त करनाचहिए जमीन मैं पर्याप्त  मात्रा में नमी हो।
3, हमें रासायनिक खेती के साथ-साथ पारंपरिक खेती की विधियों को नहीं छोड़ना चाहिए था ।
4, सरकार ने 2481 करोड़ रुपए से राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की स्थापना  की है जिसमें  किसानों को गायोंक खरीदने तथा महिला एवं पुरुष किसने को प्रशिक्षित करने तथा गायों की नसों को सधारने  पर  जोर दियाजाएगा।

Tuesday, April 14, 2026

From Mouth of Dr,Sultan Ismail Earth worm man or father of Earthworm.

1,Soil is a living medium  for growing of plants /crops.
2,Air passes through  soil .It meanse it respires.
3,living minus nonliving like air / water =nonliving .soil intake air and release carbon di oxcide. It also intake water and release water vapour .
4,Soil has got circulatory system as fertilizers and water cirulate bet been soil particles.
5,Soil has
an Excretory system also as salts are  thown  outside orsurface .
6,Soil has its reproducftive  System also as tissue cultures  are plnted in soil to produce crops .First they are grown in test tube in a media.
7,Soil has got  brain also.It knowes what has to be rotten and what has to be  grown.
8,Eroma  It's eeroma is  due to  fungus A
Actinomycin. 
9 Presently  Indian soil is in ICU.with organic Carbon 0.3 .
10. Earthworm is the pulse  of  soil. टेक्नोलॉजी ने केंचुए मार दिया। केंचुए के बारे में डार्विनन पहले एक किताब लिखी थी  उसमें उन्होंने लिखा था की केंचुआ जमीन की नाड़ी है वह जमीन की इंटेस्टाइन  है । केंचुआ कई प्रकारके होतेहैं कुछ केंचुए जमीन के सरफेस पर होते हैं कुछ बीच मैं और कुछ निचली सतह पर होते हैं।
सॉइल इकोसिस्टमम मैं माइक्रो आर्थ्रोपोड्स, माइक्रोऑर्गेनाइज्म , कार्बन आदि होते हैं। जो मिलकर एक खिचड़ी बनाते हैं और यह खिचड़ी केंचुआ खाते हैं। केंचुआ अपने शरीर से एक प्रकार का म्यूकस पदार्थ निकलता है जो केंचुए के द्वारा बनाई गई सुरंग के ऊपरी सतह पर जाताहै। ह सब हवा खाते  हैं।
11,Technologies are not negatives  but their implementation is wrong . Which give rise  wrong results . अधिक से अधिक दाने पैदा करने के लिए हाइब्रिड बनाए गए थे। इन अधिक से अधिक दाने वाले हाइब्रिड के ऊपर अधिक से अधिक कीटों का प्रकोप हुआ और उसके रोकथाम के लिए रासायनिक पेस्टिसाइड्स का उपयोग किया गया जिससे उनका नियंत्रण करने वाले नेचुरल इमेज या प्राकृतिक शत्रु खत्म हो गए तथा हानिकारक कीटों की संख्या में वृद्धि हो गई इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के रसायन हमारे विभिन्न खाद्यपदार्थ म
प्रवेश कर गए जो खाद्य श्रृंखला के. DUaraदरा हमारे शरीर में प्रवेश किए जिससे हमें विभिन्न प्रकार की बीमारी योका प्रकोप होगया । रसायनोंके अंधाधुंध प्रयोग स जमीन के अंदरप विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो गए 
 ।

Sunday, April 12, 2026

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में बदलावTra sition from chemical farming to Natural farming.

1.Fear based Agticulture. भययुक्त खेती। 
  यह तकनीक अथवा टेक्नोलॉजी काम करेगी या नहीं इस प्रकार का भय कृषकों के बीच रहता है।
2, जीवन के पचो   महाभूत अर्थात क्षति,( जमीन),पानी, पावक अर्थात अग्नि,गगन समीरा अर्थात हवा सारे संक्रमित और और प्रदूषित हो चुके हैं। हमारी जनरेशन ने ही इनको कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करके विषाक्त बना दिया  है । सबसे पहले इन सभी तत्वों को प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है।उदाहरण  के तौर पर पानी तथा मिट्टी की जांच करवाना चाहिए और उसके अनुसार पानी का पीएच तथा उसमें घुले हुए अन्य हानिकारक पदार्थ की जानकारी लेनी चाहिए इसी प्रकार मिट्टीक पीएच, उसमें जीवाश्म कार्बन की मात्रा तथा सक्ष्म
 जीवों एवं सूक्ष्म तत्वों की जानकारी लेनीचहिए । इसके साथ-साथमट्टी में मौजूद रासायनिक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी भी लेनी चाहिए और उसकी के हिसाब से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन तथा ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए जीवामृत तथा घन जीवामृत को सिंचाई के साथ फसल की बुवाई से  पहले पलावा के सथ डालना चाहिए। इसके लिए हरी खाद का प्रयोग भी करना चाहिए। रासायनिक करो का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं करना चाहिए। क्योंकि रासायनिक खादों में  कार्सिनोजेनिक पदार्थ भी पाए जाते है जिनसे बचना बहुत जरूरी है । यूरिया  अथवा नाइट्रोजन का मोबिलाइजेशन हवा केथ होना चाहिए । मानव, जानवर, जंगल ,के लिए प्रतिशत के हिसाबसे खेती में जमीन का प्रयोग करना चाहिए।
3 , खेती को ब्रदरहुड अथवा भाईचारे की हैसियतस करनी चाहिए़ और इस बात का ध्यान रखना चाहिए की अगर हम रसायन युक्त खेती करेंगे तो वह रासायनिक पदार्थ हमारे ही खाएंगे तथा उनके दुष्प्रभाव से प्रभावित होंगे और बीमार होकर अस्पताल में जाएंगे। 
4, हमें अपनी स्थानीय मिट्टीसे उगाया हुआ खाना ही खाना चाहिए़।
5 बेमौसमी सब्जी तथा फल के प्रयोग के परहेज करना चाहिए। क्योंकि भी मौसमी सब्जियों में पेस्टिसाइड अधिक मात्रा में डाले जाते हैं। हाइड्रोपोनिक पौधों से प्राप्त फल तथा सब्जियां स्वास्थ्यके लिए लाभकारी नहीं होते हैं।
6, खाद्य पदार्थों को कई बार रासायनिक इंसेंटिसाइड से स्प्रे करके बेचा जाता है और वही सब्जी हम लोग कहते हैं जिससे हमारे शरीर में विभिन् प्रकार की बीमारियां  पैदा  होती है। इसके लिए किसने समाज के बीच जागरूकता पैदाकरनी पड़ेगी।
7क्लीन कल्टीवेशन गलत है। फसल अवशेषों को खेतों में
ही डालना चाहिए।
8, पानी का वाष्पन रोकने के लिय हमें मल्चिंग करनाचहिए । इसके लिए काऊ डंग आर्ककाऊ यूरिन आदि कई प्रयोग कर सकते हैं। 
9 इंटरक्रॉपिंग तथा क्रॉप रोटेशन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। तथा जूता ए बंद कर देना चाहिए।
10 एनिमल फीड भी हमारे फीड से ही आता है। पौधों तथा मिट्टी मैं दी(deadiction) करना चाहिए।
11,आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा दिया जाता है। जैविक इनपुट्स में विभिन्न प्रकार के मित्र कीट जिसमें पर भक्षी
क किट, परजीवी किट ,विभिन्न प्रकार की मकड़या , एंटोमोफागस इंसेक्ट्स, एनपीवी वायरस, विभिन्न प्रकार के खरपतवारों के लिए पाए जाने  फाइटोफागस इंसेक्ट्स, DD 136 nematodes,, विभिन्न प्रकार की एंटागनिस्टिकफंगी, आदि शामिल है । इनकी अनु उपलब्धता आईपीएम के क्रियान्वयन की प्रमुख बाधा है। इसीलिए किसान उपयुक्त मात्रा में खेती में नासिजीव नियंत्रण हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा नहीं दे पाते हैं क्योंकि इनके लिए कोई भी प्राइवेट उद्यमी इनके उत्पादन हेतु औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए इच्छुक नहीं  होते हैं जिसकी एक वजह जैविक नियंत्रण कारकों अथवा जैविक इनपुट्स की शेल्फ लाइफ अथवा स्वयं का जीवन बहुत कम होता है तथा इनका स्टोरेज अधिक समय तक नहीं किया जा सकता है। इन्हीं सब कारणों की वजह से किसान जैविक इनपुट की क्रियाशीलता पर अधिक विश्वास नहीं कर पाता तथा इनका प्रयोग भी नहीं करता है। यद्यपि सभी डेमोंसट्रेशंस में जैव नियंत्रण कारक की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। जैव नियंत्रण कारक कुछ विशेष नशीजेवोंके नियंत्रण में बहुत ही उपयोगी अथवा मददगार सिद्ध हो चुके हैं और कुछ नशीजीवों  के नियंत्रण के लिए कुछ अन्य रसायन रहित विधियों के साथ उपयोगी साबित हुए हैं। अतः आईपीएम  के क्रियान्वयन हेतु कृषकों को जैविक नियंत्रण कारकों को अन्य रसायन रहित विधियों के साथ प्रयोग करना चाहिए। जैविक नियंत्रण कारकों को प्राकृतिक खेती के इनपुट के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
12,

Thursday, April 9, 2026

डॉ सुभाष चंद्र इंटरव्यू से।

खेती किसानी की दुनिया बाहर से जितनी बोरिंग लगती हैअंदर से उतनी  ही द‍िलचस्प है.  इसमें राजनीत‍ि, अर्थशास्त्र और व‍िज्ञान का जबरदस्त कॉकटेल है. कृष‍ि और क‍िसानों को बचाने के ल‍िए कुछ ऐसे काम भी होते हैं ज‍िसकी आम आदमी कल्पना भी नहीं करता. सरकार अनाज और फल-सब्ज‍ियों का उत्पादन बढ़ाने के ल‍िए बड़े पैमाने पर उर्वरकों का आयात करती है. लेक‍िन, आपने ऐसी कल्पना कभी नहीं की होगी क‍ि कीटों का भी आयात होता है. आप सोचेंगे कीटों का आयात क्यों? कीट तो खतरनाक होते हैं? असल में सभी कीट खेती के ल‍िए खतरनाक नहीं होते. अगर कोई कीट भारतीय कृष‍ि के ल‍िए खतरा बनने लगता है तो सरकार उसे कंट्रोल करने के ल‍िए उनके मूल देश या क्षेत्र से उनके प्राकृतिक शत्रु कीटों को इंपोर्ट करती है. दुश्मन को उसके सामने लाकर खड़ा कर देती है. नेचर का बनाया यह एक ऐसा खेल है क‍ि खेती के ल‍िए खतरनाक कीटों के प्राकृत‍िक शत्रु कीट उन्हें साफ कर देते हैं या पौधों के रास्ते से हटा देते हैं. 

बहरहाल, साल दर साल कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है लेक‍िन न तो फंगस कम हुए, न कीट लगने कम हुए और न खरपतवारों की संख्या में कोई कमी आई।

Thursday, April 2, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट(आई पी एम)

          इंटीग्रेटेड पेस्ट मनेजमेंट (आई पी एम)
आईपीएम, नासि जीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है जिसमें नाशीजीव प्रबंधन एवं संपूर्ण कृषि तत्र के  सुचारूरऊप से क्रियान्वयन करनेकी सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करके फसल पारिस्थितिक तंत्र मैं पाए जाने वाले सभी नशीजीवों  की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखते हुए खाने योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का इस प्रकार सेउत्पादन किया जाता है कि कृषि उत्पादों का अधिकतम से अधिक तम विक्रय मूल्य प्राप्त हो सके तथा साथ साथ जमीन की उर्वरा शक्ति, सामुदायिक स्वास्थ्य, फसल पारिस्थितिक तंत्र,पर्यावरण, जैव विविधता , जीवन एवं जीवन के पंचमहाभूत क्षिति , जल पावक,गगन, समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों एवं  कृषकों  की आमदनी पर विपरीत प्रभाव ना पड़े तथा प्रकृति एवं समाज के बीच सामंजस्य स्थापित  हो सके। आईपीएम के क्रियान्वयन में रसायनों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किसी भी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतुCIB &RC के द्वारा प्रदान  की गई संस्तुति के अनुसार किया जाता है।
         प्राकृतिक खेती आईपीएम का ही एक सुधरा हुआ रूप है जिसमें रसायनों का प्रयोग बिल्कुल ही नहीं  कियाजाता है तथा जमीन की उर्वरा शक्ति, जैव विविधता, जीवन के पंच महाभूत क्षिति,जल, पावक गगन समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों, वर्षा जल के संरक्षण,को भी महत्व दिया  जाता है ।
      आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती का मुख्य उद्देश्य खाने के योग्य सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, एवं इकोलॉजिकल सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए जीडीपी पर आधारित विकास के साथ-साथ इकोलॉजिकल , इकोनॉमिकल, प्राकृतिक एवं सामाजिक विकास को महत्व दिया जाता है।
         खेती कोई भी हो वह प्रकृति और उसकी व्यवस्था के द्वारा संचालित होती है अथवा क्रियान्वित की जाती  है प्रकृति  को ही भगवान  कहा जाता हैं जिसका मतलब  होता है भू अर्थात जमीन, गगन अर्थात आकाश ,वायु  , अग्नि,नीर अर्थात पानी । जीवन के इन्हीं पंचमहाभूतों का सरक्षण करनेसे खेती के लिय बहुत जरूरी है ।

Wednesday, April 1, 2026

Production in Agriculture (From Green Revolution to Ever Green Revolution ,from food security to food and ecological safety,and from food quantity to food quality and Nutritional food.)

1,Production by masses not mass production. By Dr M S Swaminathan.
2, Production cost plus 50 %. MSP. Farmula by Dr MS Swaminathan
3,Sale price of Agri produce must  be fixed by the farmers not by the   Govt.
4, Agriculture is not respectable job.
,From cip to mouth.to right to food  stage.
5,We do not bargin in  in malls but we bargin with  the  farmers .
6, Enormous use of fertilizers to illogical use of water.
7 From Green Revolution to ever Green    Rrvolution.Sustainable Agriculture .
Wheat and Rice have become Commercial crops  due to Green Revolution. 
8, Refarming the policies  related with  Agriculture.
9,Nutrition intensive Agriculture.
10,Bengal Famine from 1942 to 19 46.Nearly 40 lakh people died  due to starvation.
10,We became  exporter of wheat and rice from importer quickly hence achieved Green Revolution. Our need was calory which got from wheat and Rice 
11, Are  we  producing nutritional  food? No.
    Nutritional value of our food was reduced.Nutrition is separated from Agriculture.We enhanced the production of food grains  but not the nutritive value.
12,We should maintain soil wth organic carbon and nutrition.We need to go towards Nutrition dense Agriculture for which we need to make farmers centric policies.
13,After ten years the quality of food will remain  suitable to eat or not.
14.Our stomach is filled that is why we are talking .
15 Green Revolution has played both positive as well as negative roles.It has enhance the tendency of illlihitimate use of inputs.storing of things eventhey are not needed.Green Revolution has enhanced the inhuman tendency or nature of man.Monopolization of technology is bad.
16 Wellfare of all must be our moto.



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8,

Saturday, March 28, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (आई पी एम) विचारधारा में बदलाव

प्रारंभिक तौर पर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट अर्थात आईपीएम की  शुरुआत आईपीएम फॉर बेटर एनवायरनमेंट अर्थात उत्तम पर्यावरण हेतु आईपीएम अपनाये के नारे के साथ हुई थी ( 1991 ,-1992,,)तथा आईपीएम की की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 22 राज्यों में 26 केंद्रीय एकीकृत नासिक जीव प्रबंधन केंद्र स्थापित किए गए जिनकी संख्या बादमें 35 हो गई और अब यह संख्या 11 लोकस्ट वार्निंग आर्गेनाइजेशन के केंटो को मिलाकर तथा दो नए के दो कई मिलकर 48 हो गई है । आईपीएम में आईपीएम में सामुदायिक स्वास्थ्य, इकोसिस्टम, पर्यावरण, जैव,विधता, जीवन और उसके पंच महाभूत क्षिति, जल , पावक, गगन, समीरा तथा प्रकृति और उसके ससाधनों, समाज और उससे जुड़े हुए विभिन्न मद्दों, तथा खेती के क्रियान्वयन हेतु प्रयोग किए जानेवाले विभिन्न प्रकार की विचारधाराओं एवं रसायन रहित खाने योग्य सुरक्षित कृषि उत्पादों के उत्पादन की सपूर्ण पद्धति, उनका वैल्यूएडशन, गुणवत्ता नियंत्रण, सर्टिफिकेशन, लाइसेंसिंग,पैकेजिंग, विपणन एवं व्यापार, कॉस्ट बेनिफिट 
Ratio, खाद्य, पोषण,स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी हुई विभिन्न सुरक्षाओं, समस्याओं एवं मुद्दों को भी शमिल किया गया। इसके अतिरिक्त कृषकों की आमदनी, आदिसे जुड़े हुए मुद्दों को भी शामिल कर लिया गया। कृषि अथवा खेती का मुख्यउद्देश्य  सर्वे भवंतु सुखना सर्वेसतु निरामया है  अर्थात सभी प्राणी सुखी हों एवं निरोगी हो। इसके साथ-साथ खेती की विभिन्न प्रकार  की प्रणालीयों को  प्रकृति की व्यवस्था से जोड़ कर प्राकृतिक खेती के रूप में परिवर्तित कर दिया गया । यद्यपि 1993 के दरान इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट को प्राकृतिक फसल सुरक्षा के नाम मैं बदल दिया गया था जो बाद फिर से आईपीएम के नाम से जाना जाने लगा। 

Thursday, March 26, 2026

रासायनिक खेती के दुष्परिणाम

1, फसल उत्पादन लागत का बढ़ जाना। 
2, उत्पादन लगभग स्थिर हो गया ।
3, गांव के युवा बे रोजगार घूम रहे हैं ।
4, किसान कर्जदार हो  गया ।
5, जमीन में जीवांशकर्बन लगभग 0,3 प्रतिशत रह गया है जिस जमीन की उर्वरा शक्ति घट गई । यह कार्बन करीब एक प्रतिशत। होना चाहिए़ ।
6, बायोडायवर्सिटी नष्ट ह गई। बहुत सारेजव जंतु विलुप्त हो गए ।
7, भोजन स्तर नीचे चला गया ।
8, किसने की आत्महत्या बढ़ गई ।
9, भोजन, पानी, सब्जियां तथा फल, पशुओं का चारा तथा दूध आदिवो सीसी हो गए । जिनवा कीटनाशकों के अवशेष मिलने लगे ।
10, जलाशय खत्म हो गई।
11, भूमि की संरचना खराब हो गई । जमीन बंजर हो गई। 
12, मनो क्रॉपिंग से भोजन सिर्फ 6 फसलों तक ही सीमित रह गया यह फसल है गहूं
 चावल मक्का और गन्ना1
13 भोजन की पौष्टिकता खत्म हो गई ।
14 जल ,जमीन ,जंगल, जानवर, एवं जन सभी प्रभावित हुए ।
15, विभिन्नपकार की बीमारियां मनुष्य तथा जानवरों म
आनेलगीं ।
16, मनुष्य महार्मोंस डिसऑर्डर  के प्रभाव दिखाईद।
ने लगे ।
17,ज्यादा  उत्पादन के बावजूद फसल उत्पादों का विक्रय मूल्य काम मिल रहाह  ।
18,  1 किलो गेहूं से 900ग्राम दलियlगेहूं की कपनियां अथवा व्यापारी सुखी उनकी हैं उनकी आमदनी किसानों से अधिकह जब की किसान गेहूं के एक दाने से 1 किलो अनाज पैदा करता है। और वह कर्जदार  है और उसे कैबरा आत्महत्या करना पड़ता है  ।
19। क्लाइमेट चेंज अथवा मौसा म मै  बदलाव , तप क्रम में बढ़ोतरी, सुखआ  तथा बाढ़ की समस्या ।
20 नए-नए कीड़े तथा बीमारियों का प्रकोप। 
21, कीटों में नासि जीव नाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना। 
22 विभिन्न राशि जीव अश्कों की संख्या में अचानक वृद्धि हो जना । लाभदायक जीवन की संख्या में कमी आ जाना ।
 ।


Saturday, March 21, 2026

खेती एक संपूर्ण योजना तथा तंत्र है Farming is a complete planning and system as per need of nature and society .

                        𝗙𝗮𝗿𝗺𝗶𝗻𝗴
 IPM and Farming  is a complete planning and system of   doing crop  production,protection and it's  ,management right from  production, processing,packaging, Certification,branding and also up to the marketing to make  farming  profession profitable to the Farmers and and favourable for climate ,weather, and nature to avoid adverse  effects of chemicals and wrong agricultural practicess on nature and so ciety.
खेती फसल उत्पादन की फसल उत्पादन से लेकर, प्रोसेसिंग अथवा संस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रमाणीकरण, एवं  मार्केटिंग अथवा विपणन तक की एक संपूर्ण योजना है जो सिर्फ लागत पर आधारित ना होकर प्रकृति के संपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित है ।यह आर्थिक दृष्टिकोण से लाभकारी एवं स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से प्रकृति और समाज के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होनी चहिए। मिश्रित खेती एवं बहुस्तरीय तरीके से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
एक  खेत फसल अनेक, बीज एक उत्पादन अनेक, पौधा एक उत्पादन वर्ष अनेक । अनेक प्रकार के पौधों तथा प्रकृति के साथ सहअस्तित्व, पूरकता, स्थानीयता, एवं समृद्धि के सिद्धांत केसाथ साथ प्रकृति में पाए जाने वाले नियम , नियंत्रण  एवम संतुलन  के सिद्धांत के अनुसार खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
Many crops  in a single field.
More production from a single seed.
Production  up to many years from a single plant.
Coexixtence among nature ,different types of plants. 
Vocal for local.
 Prosperity among the Farmers.
Nature has rule ,control and balance.
Multicropping and production density  iis the need of the hour.






Friday, March 20, 2026

आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती के कुछ मूल मंत्र/, खेती का प्राकृतिक विज्ञान

1 खेती करते समय हमें यहसोचना पड़ेगा की हमे जिंदगी बचाना है या नशिजीवनाशकों को बचना है।
2, रासायनिक नासि जीव नाशक एवं उर्वरक कृषि संस्कृति की परंपरा में कभी भी शामिल नहीं थे।
3,Food security along with food ,socialand ecological safety is the main objective of IPM and Natural Farming.
4, प्राकृतिक खेती सुरक्षित भविष्य और उत्तम स्वास्थ्य का आधार है। 
5,ह्यूमन हेल्थ,प्लांट हेल्थanimal health,and soil health must be considered with a single eyeor all together to implement IPM and Natural farming.
6, खाने योग्य सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण एवं इकोलॉजिकल सुरक्षा अथवा पारिस्थितिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती का प्रमुख उद्देश्य है।
7, प्रकृतिक के सिद्धांतों पर विज्ञान को विकसित करें।
8, खेती विरोध करने का विषय नहीं है बल्कि यह समीक्षा करने का विषय है। 
9, खेती भारतीय संस्कृतिकएक सम्मानजनक काम रहा है।
     उत्तम खेती माध्यम बान 
    निकृष्ट चाकरी भिखनिदान
10, पौधोंमे एक दूसरे को पोषण का नियम, पूरकता ही उर्वरकता है, जीवजतु, पशु पक्षियों तथा वनस्पतियों के बीच परस्पर  में संबंध का नियम काम करता है जो खेती  करने मैं  सहायक होता है।
11, खेत एक फसल अनेक 
    बीज एक उत्पादन अनेक  
   पौधा एक उत्पादन वर्ष अनेक 
  हर पौधे में गुणात्मक उत्पादन  ही प्राकृतिक खेती के सिद्धांत हैं।
12, खेती की उर्वरा शक्ति के पोषक रस को खेतोंमे ही बनाया जाए तथा जैव विविधता एवं प्रकृति के ससाधनों तथा जीवन के पंच महाभूत का संरक्षण करें।
13, प्राकृतिक एवं ऑर्गेनिक खेती सह अस्तित्व एवं स्थानीयता के  सिद्धांत पर आधारित है।
14, समृद्धि ही खेती   का मूल मंत्र  है।
15, खेती में बाहरी खाद की आवश्यकता नहींहती है। क्योंकि खेत में खाद बनाने  की समर्थ  होती है। जमीन अपने उर्वरता के आधार पर खाद बनती है।
16, हरित क्रांति में प्रकृतिक को जानकारी दिया गया तथा बाजार आधारित इनपुट्स को वरीयता दी  गई  थी जिससे उत्पादन लागत में वृद्धि हुई ।
17, प्रकृति में नियम भी है, नियंत्रण भी है, और संतुलन भी है। प्राकृतिक खेती में कृत्रिमिता की जगह प्रकट की व्यवस्था को समझें ।
18, सामुदायिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, पारिस्थितिकतत्र, जैववविधता,भूमि, जल अग्नि आकाशसमीरा अथवा वायु  का संरक्षण करते हुए कम से कम खर्चे में, जीवन प्रकृति और समाज को कम से कमबधित करते हुए जब वनस्पति संरक्षण किया जाता हैतभी  हम उसको आईपीएम कहते हैं।
19, आई पी एम नाशीजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति का एक समेकित प्रबंधन की विचारधारा है।
20,There is no culture better than Agriculture.
कृषि से उत्तम कोई भी संस्कृति नहीं है।
21, खेतों के अंदर बाहर घूम कर एवं बैठकर देखें, पौधों से बात करें और अपनी खेती के विकास के लिए सोचऐं ।
22, खेती में मानसिकता के बदलाव की जरूरत है। रसायनों के उपयोग को बंद करें तथा प्रकृति और उसकीववस्था के आधार पर खेती करें । बाजार के इनपुट एस को बंद करें। खेती जीवन एवं परिवार का विषय है खेती व्यवहार एवं सहकारिता तथा सहयोग का विषय है।
23 किसानों का एक ही धर्म है वह खेती ।

Sunday, March 15, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (आईपीएम)

         इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (आईपीएम)
1,आईपीएम एक प्रकार का सामाजिक आंदोलन है जिसका उद्देश्य कम से कम खर्चे में, रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए तथा जीवन, जलवायु ,पर्यावरण ,जैव विविधता, फसल पारिस्थितिक तंत्र, प्रकृति और समाज को कम से कम बाधित करते हुए फसल उत्पादन ,फसल रक्षा तथा नाशिजीव प्रबंधन की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करते हुए जिसमें रासायनिक विधियों  का उपयोग सिर्फ किसी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतु अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग करते हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र में पाए जाने वाले हानिकारक जीवों की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखते हुए खाने के योग्य सुरक्षित भोजनके साथ खाद्य सुरक्षा , जीवन तथा इकोलॉजिकल सुरक्षा अर्थात पारिस्थितिकतंत्रीय एवं पर्यावरण सुरक्षा के साथ साथ व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कषि उत्पादों का उत्पादन किया जाता है तथा उत्पादों के अधिकतम विक्रय मूल्य की अपेक्षा की जाती है आईपीएम कहलाता है।
2, आईपीएम-नासिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है जिसमें खाने के योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन कम से कम खर्च तथा जन ,जमीन, जंगल, जलवायु, जानवर, जैव विविधता, पर्यावरण, तथा पकृति के संसाधनों एवं जीवन के पांच महाभूतों का संरक्षण करते हुए एवं समाज को कम से कम बाधित करतेहुए खेती की जाती है अथवा नाशिजीव प्रबंधन किया जाता है आईपीएम कहलाता है। आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु नासिजीव प्रबंधन की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग किया जाता है तथा रसायनों का प्रयोग दी गई संस्तुति के अनुसार अंतिम विकल्प के रूमें किया जाता है।
3,IPM is a social  movement  to reduce the use of chemicals in agriculture and to maintain harmony with nature and society.
4,Suppression of pest population by any meanse to a level at which the harm due to pest become minimum, insignificant or  minor is called pest management. When more than one methods are used to suppress the pest population below ETL  is called as Integrated Pest Management (,IPM)¡
5The minimum pest population above which the adoption of  pest management methods  is recmmonded or suggested is called as Economic Thrshold level.
6,To get rid of from  pest problem with minimum expenditure, minimum use of chemicals and least disurbance to l community health,ife , environment,ecosystem ,biodiversity,nature and it's resources , and  society ithrough adoption of all available, affordable, and feasible methods of pest management is to suppress the pest population below ETL is called as IPM.
7,IPM is an integrated management of complete Agricultural System including Pest management.
आईपीएम-नाशीजीव  प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के  समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा ।

Monday, March 9, 2026

Integrated Pest Management (IPM)

Integrated Pest Management (IPM)
            एकीकृत नाशिजीव प्रबंधन 
Of the Farmers, By the Farmers  ,For the  Farmers
 किसानों का, किसानों के द्वारा, किसानों के लिए 
Of The People,By the People,For the People.
लोगों का, लोगों के द्वारा, लोगों के लिए

Sunday, March 8, 2026

आई पी एम तथा अन्य रसायन रहित खेती को बढ़ावा देने के लिए कुछ बाधाएं

आईपीएम -नाशिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है जिसमें खाने के योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन कम से कम खर्च तथा जन, जमीन, जंगल, जलवायु, जानवर,जैव विविधता,  जन, पर्यावरण,, तथा प्रकृति के ससाधनों तथा जीवन के पंचमहाभूत का संरक्षण  करते हुए एवं समाज को कम से कम बाधित करते हुए खेती की जाती है अथवा नाशीजीव  प्रबंधन किया जाता है आईपीएम कहलाता है। आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु रसायनों का दी गई संस्कृति के हिसाब से अंतिम विकल्प के रूप में किया जाता है।
      विभिन्न वैज्ञानिकों, कृषि प्रचार एवं प्रसार कार्यकर्ताओं, बुद्ध जीवियों तथा प्रगतिशील किसानों के द्वारा विकसित की गई विभिन्न तरह की  खेती की पद्धतियों में से सुरक्षित विधियों को अपनाकर एक उपयुक्त रणनीति अपना कर  सुरक्षित भोजन के साथ साथ खाद्यसरक्षा को सुनिश्चित किया जाता है इसी को आईपीएम कहते हैं। आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु विभिन्न प्रकार की  बाधाएं  इस प्रकार हैं।
1, किसानों के द्वार पर आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती के इनपुट्स की अनु उपलब्धता ।
2, आई पी एम तथा प्राकृतिक खेती के इनपुट के उत्पादन हेतु उद्यमियों मै आईपीएम इनपुट की लॉन्चिविटी कम होने की वजह से आईपीएम इनपुट्सक उत्पादन हेतुरुचि न होना।
3, गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन न करपाना।
4, कृषि उत्पादों के उपभोक्ताओं मैं इस प्रकार की जानकारी की रसायनों के प्रयोग से उत्पादित कृषि उत्पादों में रसायनों के जहरीलेअवशेष अवशेष पाए जाते हैं जिससे कृषि उत्पादन विषाक्त  हो  चुके हैं  जो भोजन श्रृंखला के द्वारा हमारे शरीर मैं पहुंच कर एकत्रित होने पर विभिन्न प्रकार की बीमारियां उत्पन्न करते हैं के बारे मैं  जागरूकता बढ़ानी चाहिए।अतः हमें इन पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
5, कृषि उत्पादों के विपणनहेत बंजारों की अनु उपलब्धता। 
6, कृषि उत्पादों का कभी-कभी उत्पादन लागत से भी कम विक्रय मल्य मिलना।
7, कृषि उत्पादों की गणवत्ताको तथा उपभोक्ता का भरोसा बरकरार रखना ।
8, रासायनिक कीटनाशकों तथा उर्वरकों की उत्पादन कंपनियो का परोक्ष रूप में विरोध
9, सरकारी कर्मचारियों का रसायनमुक्त विधियों के प्रचार एवं प्रसार में रुचि ना लेना ।
10, रासायनिक कीटनाशक किसानों के घर पर न बनने की वजह से उनका उत्पादन कंपनियों में किया जाता है वहां पर उनकी गुणवत्ता का भरोसा नहीं किया जा सकता। 
11, रासायनिक कीटनाशकों का फ्रिक्वेंट पंजीकरण करना ।
12, रासायनिक कीटनाशकों का टीवी द्वारा प्रचार करना ।
13, ऑर्गेनिक  फार्मिंग में बहुत बड़ा झोल है 
14, किसानों के आय बढ़ाने की बात की  जाती है परंतु उनके कृषि उत्पादों के उत्पादन के बढ़ाने की तथा उसके गुणवत्ता की और ध्यान नहीं दिया जाता है।
15, किसान हितैषी नीतियों का ना होना।
16, कृषि उत्पादोंकआ लाभदायक मूल्य का न मिलना।
17, किसान पैसे देकर जहर खरीद रहा है और उसे लापरवाही से प्रयोग कर रहा है इस और ध्यान नहीं दिया जा रहा ।
18, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, जैव विविधता जीवांशकर्बन प्राकृतिक संसाधनों था जीवन के पंचमहाभूत के संरक्षण ह ध्यान ना देना।
18, मल्टीकपिंग, इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग,अंतर फसलों तथा बॉर्डर फसलों का लाभदायक कीट ऑन के संरक्षण हेतु ना लगाना ।
19, रसायन रहित खेती की विधियों को बढ़ावा दने, प्रकृति के वैभव को बढने, पर्यावरण प्रदूषण को घटाना, जैव विविधता तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए दो किसान भाई काम करते हैं तथा समाजिकउ स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं उनकोप्रोत्साहन हेतु कुछ न कुछ अनुदान अवश्य मिलना चाहिए जैसे रासायनिकफर्टिलाइजर्स की  खरीद पर किसानों को अनुदान मिलता है ।
20 किसानों को रासायनिक कटनाशकों के
 अंधाधुंध प्रयोग को न करने के लिए जागरूक करना चाहिए 21, मशीनरीकरण से कृषकों  ने पशुओं तथा जानवरों को पालना कम कर दिया है जिससे उनसे उत्सर्जित गोबर अथवा कार्बनिक पदार्थ जो जमीन में डाला जाता था और  उसकोजमीन मैं पाए जाने वाले जीवाणु अपनेभीजन के के रूप में खाते थे और उससे ह्यूमस बनता था जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती थी  यह कार्य अब नहीं होता है ।इसलिए किसानों को पशुओं को पालना चाहिए़ ।
22, प्राकृतिकखेती  के इनपुट्स तथा विधियों को आईपीएम में शामिल करना चाहिए।
23, खेतों के चारों तरफ मेड  तथा मेड पर पेड़ लगाने चाहिए जो पक्षियों  के लिए बैठकों की तरह प्रयोग किया जाते हैं  और ये पक्षी कीटों के नियंत्रण में पाना योगदान देते हैं।
24,

Thursday, February 26, 2026

बिना पानी, बिना जहर के होने वाली गुरु नानक खेती अथवा प्राकृतिक पारिस्थितिकीये खेती,-Psradoxial krishi by Dr Vinod Chaudhary.

इस खेती के निम्नलिखित तीनसद्धांत हैं:-
1,Breaking of hard core layer of soil of nearly 7 inches to 25 inches made due to use of  tractor,use of chemical fertilizers and pesticides which  prevents the entry of water in soil.It is done with the help of subsoiler.
2,Flood irrigation  and make ridges and furrows . Growcrops on beds .Mulching on beds with crops like Gowar .
3,Irrigate the crops in furrows.
4Principles of this Farming :-
   -किसी भी पौधे के विकास के लिए पानी नहीं चाहिए बल्कि नमी चाहिए ।
   -  नमी  नालियों में देना है ।
     -जमीन को सनलाइट भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे कार्बन Co2 बनकर उड़ता है। इसलिए ज्यादा जुताई भी नहीं चाहिए।
      -यूरिया जैसे रसायन ऑन तथा विभिन्न प्रकार के रसायनिक  कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से मनुष्य म   नशा की प्रवृत्ति उभरने लगती है। गेहूं और धन यह हमारा भोजन नहीं है यह सिरों तथा पक्षियों का भोजन है।
    -सिंचाई सिर्फ नालियों में करनी चाहिए जिससे नालियों की नमी बर्ड्स पर पहुंच जाएगी जो पौधों के विकास में सहायता करती है। 
      -करीब 138 फसलों में से हम सिर्फ चार फसलों तक सीमित रह गए हैं जिनके लिए पानी बर्बाद होता है ।
       -मल्चर से मल्चिंग काटकर बेड पर गिरादते हैं।
       -   खरपतवारऑन को भी मल्चिंग के काम में लाते हैं।  
       -किस प्रकार की खेती के लिए एक छोटा ट्रैक्टर चाहिए। 
         -, इस प्रकार की खेती में जमीन में सूक्ष्म जीवाणु तथा पानी की बचत होती है। 
         ,-इस प्रकार की खेती में   फसल हमेशा उत्तर दक्षिण की दिशा में लगाते हैं।   
       -खेती से संबंधित या खेती से जुड़े हुए अन्य बिजनेस को भी बढ़ाया जा सकता है।  
        -इस प्रकार की खेती से ग्लोबल वार्मिंग तथा क्लाइमेट चेंज के प्रभाव से भी बचा जा सकता है।

Sunday, February 22, 2026

जीरो बजट प्राकृतिक खेती-श्री सुभाष पालेकर जी की विचारधारा

जीरो बजट आध्यात्मिक खेती वह प्रणाली है जिसमें मुख्य फसल की लगत का मूल्य अंतर फसलों अथवा इंटरक्रॉपिंग की फसलों से निकलते हैं तथा मुख्य फसल  की उपज को मुनाफे तौर पर लिया जlता है और इसमें बाजार से कोई भी इनपुट नहीं खरीदा जाता है । इनपुट्स अपने घर से प्रयोग करना पड़ता है । इस प्रकार की खेती में मल्टीकपिंग, मल्टीलयर क्रॉपिंग को बढ़ावा दिया  जाता है तथा जुताई, नीलाई तथा किसी भी खाद का इस्तेमाल बाहर से नहीं किया जाता है। यह खेती सहजीवन के सिद्धांतों पर कार्य करती है । उदाहरण के तौर पर गाने के साथ विभिन्नपकार की फसलें जैसे अरहर, मूंग, हल्दी, आदि फसलें  लगाते  हैं । इसमें गणना 8 फीट की दूरी पर लगाते  है ।
     आध्यात्मिक खेती का मतलब  फसलों की वृद्धि एवं इच्छित उपज  के लिए सारे ससाधन अथवा इनपुट की आपूर्ति केवल प्रकृति करती है।

Saturday, February 21, 2026

आईपीएम संदेश

हमने प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल ,जमीन, जंगल, जानवर या बायोडायवर्सिटी तथा जीवन के पंचमहाभूत क्षति, जल, पावक ,गगन, समीरा, का दोहन जितना कर सकते थे उतना कर लिया है। जमीन बंजर हो चुकी है तथा जैव विविधता नष्ट हो चुकी है , जमीन की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो रही है। हम कोई अंतिम पीढ़ी के व्यक्ति नहीं हैं। अगर प्राकृतिक संसाधन इसी तरह से खत्म होते रहे तो आने वली पीढ़ियों को रोटी,पानी तथा ऑक्सीजन की भीख मांगनी पड़ेगी। पैसा कोई माने नहीं रखेगा । कागज का नोट तो छापा जा सकता है परंतु पानी ,खाना , ऑक्सीजन नहीं छापी जा सकती । प्राकृतिक संसाधन हमारे माई बाप  है जो हमारे जीवन को सुरक्षित एवं संचालित रखते हैं । अतः जीवन को बरकरार रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ना करें। और कृषि तथा अन्य विकास को विनाशकारी ना बनाया जाए तथा कृषि एवं अन्य टेक्नोलॉजी को कृषक, प्रकृति और जीवन हितैषी बनाया जाएं जिससे सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। सामुदायिक स्वास्थ्य, फसल पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता , पर्यावरण, जीवन, प्रकृति ,किसान एवं समाज की सुरक्षा हेतु आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती अपनाएं । भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाएं तथा प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण करें। इसके लिए वैज्ञानिकों, बुद्ध जीवियों, तथा विकसित कृषकों के द्वारा विकसित की गई विभिन्न प्रकार  की कृषि उत्पादन प्रणालियों तथा विचारधाराओं से चयन करके एक प्रकृति व समाज हितैषी समेकित एवं हर प्रकार से लाभकारी विधि को विकसित किया जए ।

टिकाऊ कृषि अथवा सस्टेनेबल एग्रीकल्चर

यह एक ऐसीकषि पद्धति है जो पर्यावरण संरक्षण, अधिक लाभ, और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बनती है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे मिट्टी, पानी, बयोडायवर्सिटी, ह्यूमस और जीवांश कार्बन को नुकसान पहुंच चाय बिना कम लागत और स्थानीय संसाधनों के उपयोग से भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भोजन का उत्पादन करना है । इस खेती मैं रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद या फसल चक्र, एकीकृत नासि जीवपबंधन, एकीकृत पोषण तत्वों का प्रबंधन पर जोर दिया जाता है और किसानों की आय बढ़ाने में प्राथमिकता दी जाती है। इस खेती में प्रयोग किए  जाने वाली गतिविधियां निम्नलिखित हैं ।
1,Allied agribusiness 
2,To reduce the cost of cultivation.
3,Integrated Pest Management ,(IPM).
4,Water Management.
5,Crop rotation 
 6,  Soil health.
7, Balance use of fertilizers.
8,Integrated Nutrients Management.
9., Integrated disease Management.
10,Integrated weed management.

Wednesday, February 18, 2026

आईपीएम हमारे हिसाब से

आईपीएम-नाशीजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र                        अथवा                पद्धति का एक समेकित                  प्रबंधन ।
नाशिजीव प्रबंधन
शर्त अथवा राइडर -फसल पारिस्थितिक तंत्र में  नशीजीवों                            की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के                             नीचे सीमित रखना। 
आर्थिक हानि स्टर-फसल पारिस्थितिक तंत्र में नशीजीवों की कम से कम वह संख्या जिसके ऊपर नासि जीव प्रबंधन की विधियों  को अपनाना आवश्यक होता है आर्थिक हानि स्टार कहलाता है। 
IPM- To get rid of from pest problems with minimum expenditure, minimum use of chemicals only to solve or to remove any pest emergency situation or without  use of chemicals with least  disturbance to life ,nature and society through adoption of all available , affordable and feasible methods of pest management or doing farming in compatible manner is called as Integrated Pest Management or IPM.
खेती करने की अथवा नासि जीव प्रबंधन करने की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करते हुए जिसमें रासायनिक विधियों का प्रयोग सिर्फ किसी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतु ही इस्तेमाल करते हुए कम से कम खर्चे में, रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए अथवा बिना प्रयोग किए हुए तथा जीवन, प्रकृति और समाज को कम से कम बाधित करते हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र में नशीजीवों  की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखना आईपीएम अथवा एकीकृत नासि जीव प्रबंधन कहलाता है।            आईपीएम, बीज से लेकर सुरक्षित फसल उत्पादों के उत्पादन,भडारण , विपणन तथा व्यापार व फसल उत्पादों के अंतिम प्रयोग , फसलअवशेषों का प्रबंधन
एवं अगली फसल की बुवाई की तैयारी तक की नाशिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा कृषि व्यवसाय या कृषि ऑक्यूपेशन के समेकित प्रबंधन की एक कार्य शैली, विज्ञान, दर्शन, आध्यात्म, समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र, टेक्नोलॉजी, प्रबंधन, योजना, नीति शस्त्र एवं विचारधारा है जिसमें कम से कम खर्चे में, रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए तथा प्रकृति, पर्यावरण ,समाज एवं जीवन को कम से कम बाधित करते हुए खेती करने की एवं वनस्पति संरक्षण करने की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करते हुए जिसमें रासायनिक विधियों का प्रयोग सिर्फ अंतिम विकल्प के रूप में किसी आपातकाल स्थिति के निदान हेतु प्रयोग करते हुए ,खेतों में नाशिजीवों की संख्या को आर्थिक हानि स्तर के नीचे सीमित रखते हुए नाशिजीवों की समस्याओं से छुटकारा प्राप्त करने के साथ-साथ फसलों के उत्पादों का अधिक से अधिक उत्पादन एवं उनका अधिक से अधिकविक्रय मूल्य प्राप्त करने के साथ साथ खाने के योग्य सुरक्षित एवं पर्याप्त अथवा अधिकतम भोजन तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन किया जाता है आई पी एम कहलाता है । 
नासि जीव प्रबंधन के उद्देश्य :-
             Food Security along with food safety
            सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना, फसल उत्पादन मूल्य में कमी करना तथा अधिक से अधिक विक्रय मूल प्राप्त करते हुए खाने के योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन करना। 
उत्पादन लागत घटना, उत्पादन बढ़ाना, उत्पादन की गुणवत्ता एवं उनकी पौष्टिकता में सुधार लाना, मनुष्य तथा पशुओं को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से छुटकारा देना प्राकृतिक खेती तथा आईपीएम के मुख्य उद्देश्य है।
            सर्वे भवंतु सुखना, सर्वे संतु निरामया अर्थात इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव सुखी एवं निरोगी हो ।
     आज की खेती धन कमाने का विषय नहीं रह गया बल्कि अपना अस्तित्व बचाने का विषय बन गया है क्योंकि जमीन में जीवांश कार्बन 0.3 प्रतिशत ही रह गया है जो काम से कम एक परसेंट होना चाहिए । जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म होने के कगार पर आ गई है। भोजन जहरीला हो गया है। जमीन में पानी खत्म हो रहा है। जंगल खत्म होने से बरसात कम हो रही है। ग्रीनहाउस गैसेस के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है जिससे वातावरण का टेंपरेचर बढ़ रहा है।
फसल उत्पादन कैसे बढ़ाएं:-
             खेतोंमें अथवा मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन एवं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाते हुए ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना। जीवांश कार्बन को बढ़ाने हेतु खेतों में पशुओं के मल मूत्र , हरी खाद का प्रयोग तथा फसलों के अवशेषों का अच्छा दन करना । ह्यूमस से ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती के सिद्धांत के अनुसार खेती का कोई भी इनपुट बाजार से प्राप्त नहीं करना चाहिए।
जमीन में कार्बनिक पदार्थ डालना ना भूले। अभी हम प्रकृति को लूट कर धन बनाना चाहते हैं परंतु प्राकृतिक खेती एवं आईपीएम का उद्देश्य प्रकृति को स्ट्रांग बनाना है। अगर धरती में ह्यूमस , जीवांश कार्बन, पानी, फसल पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता आदि खत्म हो गई तो इंसान को कौन बचाएगा। आता है आगे की आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा हेतु जमीन तथा जीवन के पांच महाभूतों का प्रकृति में सरक्षण अवश्य करनाचहिए । किसानों के चेहरे पर मुस्कान तब आएगी जब कृषि उत्पादन लागत घटेगी, कृषि उत्पादों का अधिक मूल्य मिलेगा । शहरों में रहने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान तभी आएगी जब उनको बीमारियों से मुक्ति मिलेगी तथा उन्हें खाने के लिए रसायन मुक्त भोजन मिलेगा । और इसके लिए जमीन की उर्वरा शक्ति जैव विविधता जमीन में पानी ,जंगल, को विकसित करना पड़ेगा। जमीन में वभिन्न
 फलदार वृक्षों के साथ-साथ नीम के पेड़ भी लगाना चाहिए। प्रकृतिक खेती की विधियां:-
1, जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ते हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता, जैव नियंत्रण कारकों तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना तथा जमीन में जीवाश्म कार्बन एवं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाना ।
2, जल ,जमीन ,जंगल, जानवर अथवा जीव, जलवायु एवं जन का संरक्षण करना अथवा ध्यान रखना। 
3, जीवामृत एवं संजीवनी खाद को बनाना एवं प्रयोग करना।
4, इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग को अपनाते हए
 खेती करना। 
5, फसल अवशेषों को ना जलाना। 
6, रसायनों का इस्तेमाल न करना।
7, फसल उत्पादन लागत कम करना तथा  फसल उत्पादों की गुणवत्ता में सुधारना।
8, फसलों का विविधीकरण अथवा मल्टीकपिंग पद्धति अपनाना।
9, खेतों की चरों तरफ मेड बनाना तथा मेड पर पेड़ लगाना जो विभिन्न प्रकार के पक्षियों के बैठने के काम में आते हैं और यह पक्षी विभिन्न प्रकार के नशीजीवों के नियंत्रण में सहायक होते हैं।
10, खेतों में पशुओं के मल मत्र
 तथा फसलों के अवशेषों का आरक्षण करना। 
11, रासायनिक पेस्टिसाइड्स के स्थान पर जैविक पेस्टिसाइड्स का प्रयोग करना। 
12, खेतों में खेत जंगल बनाना। तथा एक फसल प्रणाली के सन परबहुफसली फसल उगाना। 
13, रासायनिक खादों के  स्थान पर हरी खादों को बढ़ावा देना।
14, पशुपालन को बढ़ावा देना प्राकृतिक खेती का एक मुख्य घातक है इससे पशु ऑन के द्वारा उत्सर्जित मलमूत्र खेतों मैं कार्बनिक पदार्थ के रूप मैं डाला जाता है जो सूक्ष्मजीवों के द्वारा भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है जिससे जीवांश कार्बन तथा ह्यूमंस की निर्मित होती है जो मिट्टी कीर्वरक शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता हैं।
प्राकृतिक खेती-प्रकृति की परस्पर्ता के साथ कदम ताल मिलाकर खेती करना प्राकृतिक खेती कहलाता है ।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार अथवा उसमें कुछ सुधार करके खेती करना प्राकृतिक खेती कहलाता है।
प्राकृतिक खेती प्रकृति में चलरही एक स्वचालित ( सेल्फऑरनाइज्ड), स्वयं सकय(सेल्फ एकव), स्वयं पोसी (सेल्फ नॉरिश्ड),स्वयं विकासी (सेल्फडवलपिंग), स्वयं नियोजित (सेल्फ प्लांड), सहजीवी(सिंबायोटिक) एवं आत्मनिर्भर (सेस्टैंड) फसल उत्पादन, फसल रक्षा, फसल प्रबंधन व्यवस्था पर आधारित तरीकों का अध्ययन करके उनसे संबंधित गतिविधियों को विकसित करके करकेकी जाती है। इस खेती का प्रमुख उद्देश्य प्रकृति के ससाधनों, जीवनके पंचमहाभूतों  क्षति,जल , पावक ,गगन, समीरा, का संरक्षण करते हुए कृषकों की आमदनीको बढ़ाना तथा भूमि की उर्वरक शक्ति कोभी बढ़ाना है। प्रकृति में नियम भी  है,नियंत्रण  भी है,और संतुलन भी है। प्रकृति अथवा प्राकृतिक खेती सहजीविता के सिद्धांत पर आधारित है। इस खेती में पूरकता, उपयोगिता, और समृद्धि का सिद्धांत लागू होता  है । इस खेती में मल्टी क्रॉपिंग करते हैं जिसमें एक फसल दूसरे फसल की मदद करती है । खेती में हमें उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन लागत भी कम करनी है। प्राकृतिक खेती
 या कोई अन्य खेती विज्ञान के साथ साथ हमारी सस्कृति है जिसमें खेती करने का तरीका किसानों ने अपने  पूर्वज किसानों से  करके  सीखा  है और आधुनिक कृषि पद्धति वैज्ञानिकों से सखी है। आधुनिक पद्धति एक क्रियान्वयन में विभिन्नपकारमें समस्याएं सामने आई है जिससे उनका क्रियान्वयन सुचारू रूप से कई बार नहीं हो सका तथा उसकी वजह से विभिन्न प्रकार के दुष्परिणाम भवि सामने आए हैं जिन्हेंदर करनाधि अति आवश्यक है।
 जीवामृत बनाने की विधि-
पानी                             200 lit
जंगल की जीवाश्म कार्बन 
 तथा सूक्ष्म जीवाणु युक्त मिट्टी 5 kg
गुड.                                 5kg
आटा.                                5kg 
15 दिनों के बाद फिर आटा         3 kg and Gud 3kg
10 दोनों के बाद आटा                 2 केजी एंड गुड2केजी
इसको एक पंजे की मदद से हर रोज हिलते हैं इस प्रकार से 5 महीने में 15 बार अच्छा और आटा डाला जाता है जिससे जीवामृत तैयार हो जाएगा। 20 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ के लिए पर्याप्त होता है। जीवामृत प्रयोग करते समय खेत में नमी होना बहुत आवश्यक है इसलिए कई बार जीवो अमृत का प्रयोग पलावा के समय करते हैं। इसके साथ-सा द खेत में फसलों के अवशेष तथा मल मूत्र का होनाभी बहुत आवश्यक है जो जीवाणुओं के भजन का काम करता है। 
घन जीवामृत बनाना:-
एक कुंटल सूखे पशुओं के गबर को गिला करके जीवामृत मिलकर धन जीवन अमृत बनाया जाता है यह भी पलावा के समय इस्तेमाल किया जाता है। 
संजीवनी खाद बनाना:-10 एकड़ के लिए 
ताज गोबर                  30 kg 
नीम के पत्ते।               30 केजी अथवा
नीम की निंबोली।           10 केजी अथवा 
आंकड़ा के पत्ते।              2ओ केजी अथवा 
तंबाकू के पत्ते।                  5 केजी 
गुड।                                3केजी 
पानी                                 63 केजी
सात आठ दिनों तक धूप में  रखें ।


 
  

Saturday, February 14, 2026

Different types of farming

1.Old Tradditional  Farming 
2.Jeevan Nirvahan Kheti.
3.Mishrit kheti.
4.Samekit  kheti.or Integrated Farming.
5,Drip irrigation .
6,Mulching System.
7,Permaculture
8,Zerobidget Farming.
9,Natural Farming.
10 ,IPM Farming System.
11..Subhash Paleker Zerobudget farming 







5.

Monday, January 12, 2026

फसलों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का विज्ञान

भूमिमैं कार्बन बढ़ा दो। जीवाणु कार्बन को खाएंगे फिर मरेंगे और भूमि में फिर ह्यूमस बनेगा इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी। इतनी सी साइंस है भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने की।
फसलों को जीवांश की जरूरत होती है। जीवांश विभिन्न पकार फसलों के अवशेषों तथा जीवों के मल मूत्र आदि को जमीन अथवा खेतों में डालने से जीवाणुओं ki क्रिया के द्वरा ह्यूमस केरूप में बनता है जो भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ात है। अतः भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के  लिए खेतों में जीवो का मल मत्र तथा फसलों के अवशेष आदि डालने चहिए ।
हमें प्राकृतिक खेती ही करनी चाहिए और रसायनों के उपयोग को खेती मैं बिल्कुल ही बंद करनाचहिए । क्योंकि रसायनऑन के अवशेष खाद्य श्रृंखला केद हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं और हमें बीमारियां देते हैं। इस प्रकार से रासायनिकद्वारा विषाक्त भोजन मिलता है। हमारे आगे आने वाली पीढियां को तो यह भी नसीब नहीं होगा क्योंकि रसायनों के उपयोग से जमीन मेंपाए जान वाले उपयोगी जवाणु जो हमस का निर्माण करते ह खत्म होने की कगार पर हैं ।
जमीन को जिंदा करदो इतना सा विज्ञान है प्राकृतिक खेती का । जमीन में जीवाणुओं की  वापसी करनa ही प्राकृतिक खेती का तरीकa है।
फसल पारिस्थितिक तंत्रमैं जैव वविधता बढ़ाने के लिए खेतों की मेड़ों पर थोड़ी-थोड़ीद विभिन्न प्रकार के पेड़ लगाने चाहिए जिस पर चिड़िया अपना बेड का बना सके और वह खेतों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार k नाशिकीबों की संख्या क नियंत्रित कर सके। 
0 खेतों के लेवल ka समतलीकरण करना चाहिए और उनके चारों तरफ चौड़ी मेड बनाना चहिएजिससे खेतों का जीवांश कार्बन दूसरेखेतों मैं बहकर न जा सके। 
नशीजीबों के प्रबंधन ह विभिन्न प्रकार की विधियां जैसे परंपरागतविधिया, कल्चरल विधियां, मैकेनिकलवधियां, जेनेटिकली वधियां, तथा नासिजीव निगरानी एवं आकलन तथा फसल पारिस्थितिकतंत विश्लेषण करते हुए आवश्यक एवं उचित प्रकार का इटरवेंशनका करते हुए (सही नासि जीवों पर, सही नसी जीवनशकों का, सही समय पर, सहीमत्रा में, सही विधि द्वारा) उपयोग करते हुए सिर्फ किसी विशेष आपातकालीन स्थिति के निदान हेतु प्रयोग करते हुए फसल पारिस्थितिकतत्र में  नशीजीवों की संख्या ko आर्थिक हानी स्टार के नीचे रखकरनाशी जीवों की समस्याओं से जब  छुटकारा  प्राप्त कियाजता है तब हम उसे एकीकृत नासिक प्रबंधन कहते हैं। एकीकृत नाशिजीव  प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य कम से कम खर्चे में तथा रसायनोंका कम से  कम उपयोग करते हुए तथा प्रकृति जीवन और समाज को कम से काम बाधित करतेहुए खाने के योग सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों ka उत्पादन करके सुरक्षित भोजन केसा खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित करना तथा कृषि उत्पादों का अधिक से अधिक विक्रय मूल्य प्राप्त करना है।