Sunday, April 19, 2026

प्राकृतिक खेती- डॉ वी ,के सचान

आज की खेती अथवा  रासायनिक खेती  में निवेश बहुत लगता है। किसान पहले महंगे से महंगे बीज खरीदते हैं जिसमें बहु अधिक पैसा लगता है। जबकि बीज पहले  अपने घरों में ही किसान बनाते थे । इसके अतिरिक्त विभिन्नपकार के रसायनों जैसे उर्वरक, कीटनाशक, फफूंदी नाशक, खरपतवार नाशक, विभिन्न प्रकार के ग्रोथ प्रमोटर्स, को उच्च दामों पर बाजार से खरीदे जाते हैं जिससे किसानों का अधिकांश पैसा लागत के रूप मे लग जाता है । इसी प्रकार से ट्रैक्टरों के द्वारा जुटाई, ट्यूबवेल से पानी तथा बिजली का बिल, विभिन्न परकार की कल्चरल क्रियाओं को जब मजदूरों के द्वारा कराया जाता है तो उसमें बहुत सारा खर्च होता है। अर्थात जो पैसा हमें अपने घर पर होना चाहिए़ वो  बाजार मैं देना पड़ता है। इस प्रकार से किसानों की कुल आय में काफी कमी आ जाती हैं।
धरती की उर्वरता शक्ति ,धरती में जीवाश्म कार्बन तथा ह्यूमंस की मात्रा कम  हो  जाने से  धरती  की उर्वरा शक्ति बहुत ही कम हो गई है । अतः हमें धरती मैं  हमास की 

 मात्रा तथा सूक्ष्म जीवाणु कि संख्या बढ़ाना पड़ेगा जिससे जमीन  की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो सके। जमीन की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करना आज की परम आवश्यकता है ।
जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाने के लिए पशुओं के मल मूत्र तथा   फसलों के अवशेष तथा हरी खाद्य  का प्रयोग करना चाहिए़।तथा सूक्ष्म जीवाणुओ की संख्या में बढ़ाने के लिए जीवामृत, धनजीव अमृत आदि को प्रयोग  के  साथ जब खेत मैं  पर्याप्त नमी हो फसल बो ने से पहले पलेवा के साथ प्रयोग   करना चाहिए़।
जमीन मै से जीवांश कार्बन को दूसरे खेत मैं  जाने रोकने के लिय खेतों के चारों तरफ मेड बनाना चाहिए    तथा मीडो पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वृक्ष लगाने चाहिए जिनको पक्षी बैठकों के रूप में प्रयोग कर सकें।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार या उसमें कुछ सुधार करके जब खेती की जाती है तब उसे प्राकृतिक खेती कहते हैं। प्राकृतिक खेती एक विचार है। यह एक जीवन शैली है ।
जब हमारा विचार प्रकृतिमय  हो जाएगा। तभी हम प्राकृतिक खेती कर सकते हैं ।
जब हमें प्रकृति, और उसके संसाधनों तथा जैव विविधता, पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदना,सम्मान,एवं दर्द महसूस होगा और अंदर से यह भी महसूस होगा कि कहीं  रसयनो के दुसप्रभावों  के शिकार कहीं हम या हमारे परिवारजन न हो जाएं  तब ही हमारे मन मैं प्राकृतिक खेती के प्रति रुझान पैदा होगा और हम प्राकृतिक खेती कने के लिय आगे बढ़ सकें ge। 
प्राकृतिक खेती का उद्देश्य सर्वे भवंतु सuखना  , सर्वेश संतु निरामया अर्थात इस ब्रह्मांड मेंपाए जानेवाले  सभी जीव   सुखी तथा निरोगी हो। प्रकृति को बर्बाद ना करें। हम इस प्रकार से खेती करें कि जमीन की उर्वर शक्ति,जैव विविधता,जल,जंगल, जानवर,जलवायु, और जन  पर कोई  विपरीत प्रभाव ना पड़े इसी को हम प्राकृतिक खेती कहते हैं। जमीन मैं जैविक   कार्बन की मात्रा को इस समय 0,3  है वह 1,0 तक पहुंच जाय । जमीन मैं तो जीवांश कार्बन को  बढ़ाना ही पड़ेगा। पानी है जिंदगानी इसके बगैर बेकार है जिंदगी की कहानी ।पानी को तो बचाना ही पड़ेगा। गाय आधारित खेती की जगह हमें  बैंल पर आधारित खेती करनी ही पड़ेगी और इनका गोबर खेत में डालने पड़ेगा तभी प्राकृतिक खेती हो सकेगी। How to save soil fertility is the main Mantra of prakritik kheti. यह धन कमाने का वक्त नहीं है यह जान बचाने का समय है।

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