Monday, April 20, 2026

प्लांट प्रोटेक्शन (पादप संरक्षणकृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत फसलों को कीटों, बीमारियों, खरपतवारों और हानिकारक जीवों से बचाकर उनकी उत्पादकता और गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जाता है। इसका उद्देश्य फसलों को नुकसान से बचाना और पैदावार बढ़ाना है, जिसके लिए यांत्रिक, रासायनिक, जैविक और कृषि पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
प्लांट प्रोटेक्शन के मुख्य पहलू:

Sunday, April 19, 2026

प्राकृतिक खेती- डॉ वी ,के सचान

आज की खेती अथवा  रासायनिक खेती  में निवेश बहुत लगता है। किसान पहले महंगे से महंगे बीज खरीदते हैं जिसमें बहु अधिक पैसा लगता है। जबकि बीज पहले  अपने घरों में ही किसान बनाते थे । इसके अतिरिक्त विभिन्नपकार के रसायनों जैसे उर्वरक, कीटनाशक, फफूंदी नाशक, खरपतवार नाशक, विभिन्न प्रकार के ग्रोथ प्रमोटर्स, को उच्च दामों पर बाजार से खरीदे जाते हैं जिससे किसानों का अधिकांश पैसा लागत के रूप मे लग जाता है । इसी प्रकार से ट्रैक्टरों के द्वारा जुटाई, ट्यूबवेल से पानी तथा बिजली का बिल, विभिन्न परकार की कल्चरल क्रियाओं को जब मजदूरों के द्वारा कराया जाता है तो उसमें बहुत सारा खर्च होता है। अर्थात जो पैसा हमें अपने घर पर होना चाहिए़ वो  बाजार मैं देना पड़ता है। इस प्रकार से किसानों की कुल आय में काफी कमी आ जाती हैं।
धरती की उर्वरता शक्ति ,धरती में जीवाश्म कार्बन तथा ह्यूमंस की मात्रा कम  हो  जाने से  धरती  की उर्वरा शक्ति बहुत ही कम हो गई है । अतः हमें धरती मैं  हमास की 

 मात्रा तथा सूक्ष्म जीवाणु कि संख्या बढ़ाना पड़ेगा जिससे जमीन  की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो सके। जमीन की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करना आज की परम आवश्यकता है ।
जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाने के लिए पशुओं के मल मूत्र तथा   फसलों के अवशेष तथा हरी खाद्य  का प्रयोग करना चाहिए़।तथा सूक्ष्म जीवाणुओ की संख्या में बढ़ाने के लिए जीवामृत, धनजीव अमृत आदि को प्रयोग  के  साथ जब खेत मैं  पर्याप्त नमी हो फसल बो ने से पहले पलेवा के साथ प्रयोग   करना चाहिए़।
जमीन मै से जीवांश कार्बन को दूसरे खेत मैं  जाने रोकने के लिय खेतों के चारों तरफ मेड बनाना चाहिए    तथा मीडो पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वृक्ष लगाने चाहिए जिनको पक्षी बैठकों के रूप में प्रयोग कर सकें।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार या उसमें कुछ सुधार करके जब खेती की जाती है तब उसे प्राकृतिक खेती कहते हैं। प्राकृतिक खेती एक विचार है। यह एक जीवन शैली है ।
जब हमारा विचार प्रकृतिमय  हो जाएगा। तभी हम प्राकृतिक खेती कर सकते हैं ।
जब हमें प्रकृति, और उसके संसाधनों तथा जैव विविधता, पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदना,सम्मान,एवं दर्द महसूस होगा और अंदर से यह भी महसूस होगा कि कहीं  रसयनो के दुसप्रभावों  के शिकार कहीं हम या हमारे परिवारजन न हो जाएं  तब ही हमारे मन मैं प्राकृतिक खेती के प्रति रुझान पैदा होगा और हम प्राकृतिक खेती कने के लिय आगे बढ़ सकें ge। 
प्राकृतिक खेती का उद्देश्य सर्वे भवंतु सuखना  , सर्वेश संतु निरामया अर्थात इस ब्रह्मांड मेंपाए जानेवाले  सभी जीव   सुखी तथा निरोगी हो। प्रकृति को बर्बाद ना करें। हम इस प्रकार से खेती करें कि जमीन की उर्वर शक्ति,जैव विविधता,जल,जंगल, जानवर,जलवायु, और जन  पर कोई  विपरीत प्रभाव ना पड़े इसी को हम प्राकृतिक खेती कहते हैं। जमीन मैं जैविक   कार्बन की मात्रा को इस समय 0,3  है वह 1,0 तक पहुंच जाय । जमीन मैं तो जीवांश कार्बन को  बढ़ाना ही पड़ेगा। पानी है जिंदगानी इसके बगैर बेकार है जिंदगी की कहानी ।पानी को तो बचाना ही पड़ेगा। गाय आधारित खेती की जगह हमें  बैंल पर आधारित खेती करनी ही पड़ेगी और इनका गोबर खेत में डालने पड़ेगा तभी प्राकृतिक खेती हो सकेगी। How to save soil fertility is the main Mantra of prakritik kheti. यह धन कमाने का वक्त नहीं है यह जान बचाने का समय है।

Friday, April 17, 2026

Acharya दev brat - His thoughts about prakritik kheti.

Difference between ween Organic  kheti and Prakritic kheti.
1, जैविक   खेती में ना खर्चा कम होता है ,न उत्पादन बढ़ता है और ना ही परिश्रम कम   होता  है । इस खेती मैं भी इनपुट्स  बाज़ार ही खरीदे जाते हैं जो रासायनिक इनपुट से भी  महंगे होते  हैं ।
2, ऑर्गेनिक खेती के प्रमुख तीन प्रकार के इनपुट्स होते हैं ।
ये हैं ,1, कंपोस्द खाद ''2, वर्मीकपोस्ट खाद ,,3,, बायो डायनॉमिक्स अर्थात जानवरों के सींगों की खाद ।
इन तीनों प्रकार के इनपुट एस का प्रयोग करना साधारण तौर पर किसानों के लिए असंभव है तथा महंगा है।
3, केंचुआ के खाद मैं विभिन्न प्रकार के हैवीमेटल पाए जाते हैं  जो हमारे शरीर में जा करके तरह-तरह की बीमारियां पैदा  करते हैं। गोबर की  खाद वातावरण का टेंपरेचर जब 40 डिग्री से ऊपर होता है तो कार्बन तथा ऑक्सीजन से रिएक्ट करके कार्बन मोनोऑक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसे उत्पन्न करते हैं जो ग्रीनहाउस गैसेस है जींस वातावरण का टेंपरेचर बढ़ता है इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। 
प्राकृतिक खेती 
1, यह खेती प्रकृति तथा जंगल के सिद्धांतऑन  पर आधारित है। प्रकृति जब जंगल के सभी पेड़ पौधों की भरपूर पूर्ति करती है तो हमारे खेतों  की फसलों   की भी पूर्ति करेगी।
2 प्राकृतिक खेत भूमि मेंपाए जाने  वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों पर आधारित खेती है। जो पतझड़ होने के  बाद  नमी की उपस्थिति में पौधों के  पत्तों को सदा कर ऑर्गेनिक कार्बन में बदलते हैं जो बाद  में   ह्यूमस मैं बदल जाता है।ह्यूमस ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से सूक्ष्म जीव खत्मह चुके हैं । अत इनकीसख्या को जमीन मैं बढ़ाना  अति आवश्यक है। इसके लिए जमीन में कार्बनिक पदार्थ जैसे जानवरों का मल मूत्र पौधों व फसलों के अवशेष तथा जीवामृत का प्रयोग उसे वक्त करनाचहिए जमीन मैं पर्याप्त  मात्रा में नमी हो।
3, हमें रासायनिक खेती के साथ-साथ पारंपरिक खेती की विधियों को नहीं छोड़ना चाहिए था ।
4, सरकार ने 2481 करोड़ रुपए से राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की स्थापना  की है जिसमें  किसानों को गायोंक खरीदने तथा महिला एवं पुरुष किसने को प्रशिक्षित करने तथा गायों की नसों को सधारने  पर  जोर दियाजाएगा।

Tuesday, April 14, 2026

From Mouth of Dr,Sultan Ismail Earth worm man or father of Earthworm.

1,Soil is a living medium  for growing of plants /crops.
2,Air passes through  soil .It meanse it respires.
3,living minus nonliving like air / water =nonliving .soil intake air and release carbon di oxcide. It also intake water and release water vapour .
4,Soil has got circulatory system as fertilizers and water cirulate bet been soil particles.
5,Soil has
an Excretory system also as salts are  thown  outside orsurface .
6,Soil has its reproducftive  System also as tissue cultures  are plnted in soil to produce crops .First they are grown in test tube in a media.
7,Soil has got  brain also.It knowes what has to be rotten and what has to be  grown.
8,Eroma  It's eeroma is  due to  fungus A
Actinomycin. 
9 Presently  Indian soil is in ICU.with organic Carbon 0.3 .
10. Earthworm is the pulse  of  soil. टेक्नोलॉजी ने केंचुए मार दिया। केंचुए के बारे में डार्विनन पहले एक किताब लिखी थी  उसमें उन्होंने लिखा था की केंचुआ जमीन की नाड़ी है वह जमीन की इंटेस्टाइन  है । केंचुआ कई प्रकारके होतेहैं कुछ केंचुए जमीन के सरफेस पर होते हैं कुछ बीच मैं और कुछ निचली सतह पर होते हैं।
सॉइल इकोसिस्टमम मैं माइक्रो आर्थ्रोपोड्स, माइक्रोऑर्गेनाइज्म , कार्बन आदि होते हैं। जो मिलकर एक खिचड़ी बनाते हैं और यह खिचड़ी केंचुआ खाते हैं। केंचुआ अपने शरीर से एक प्रकार का म्यूकस पदार्थ निकलता है जो केंचुए के द्वारा बनाई गई सुरंग के ऊपरी सतह पर जाताहै। ह सब हवा खाते  हैं।
11,Technologies are not negatives  but their implementation is wrong . Which give rise  wrong results . अधिक से अधिक दाने पैदा करने के लिए हाइब्रिड बनाए गए थे। इन अधिक से अधिक दाने वाले हाइब्रिड के ऊपर अधिक से अधिक कीटों का प्रकोप हुआ और उसके रोकथाम के लिए रासायनिक पेस्टिसाइड्स का उपयोग किया गया जिससे उनका नियंत्रण करने वाले नेचुरल इमेज या प्राकृतिक शत्रु खत्म हो गए तथा हानिकारक कीटों की संख्या में वृद्धि हो गई इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के रसायन हमारे विभिन्न खाद्यपदार्थ म
प्रवेश कर गए जो खाद्य श्रृंखला के. DUaraदरा हमारे शरीर में प्रवेश किए जिससे हमें विभिन्न प्रकार की बीमारी योका प्रकोप होगया । रसायनोंके अंधाधुंध प्रयोग स जमीन के अंदरप विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो गए 
 ।

Sunday, April 12, 2026

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में बदलावTra sition from chemical farming to Natural farming.

1.Fear based Agticulture. भययुक्त खेती। 
  यह तकनीक अथवा टेक्नोलॉजी काम करेगी या नहीं इस प्रकार का भय कृषकों के बीच रहता है।
2, जीवन के पचो   महाभूत अर्थात क्षति,( जमीन),पानी, पावक अर्थात अग्नि,गगन समीरा अर्थात हवा सारे संक्रमित और और प्रदूषित हो चुके हैं। हमारी जनरेशन ने ही इनको कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करके विषाक्त बना दिया  है । सबसे पहले इन सभी तत्वों को प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है।उदाहरण  के तौर पर पानी तथा मिट्टी की जांच करवाना चाहिए और उसके अनुसार पानी का पीएच तथा उसमें घुले हुए अन्य हानिकारक पदार्थ की जानकारी लेनी चाहिए इसी प्रकार मिट्टीक पीएच, उसमें जीवाश्म कार्बन की मात्रा तथा सक्ष्म
 जीवों एवं सूक्ष्म तत्वों की जानकारी लेनीचहिए । इसके साथ-साथमट्टी में मौजूद रासायनिक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी भी लेनी चाहिए और उसकी के हिसाब से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन तथा ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए जीवामृत तथा घन जीवामृत को सिंचाई के साथ फसल की बुवाई से  पहले पलावा के सथ डालना चाहिए। इसके लिए हरी खाद का प्रयोग भी करना चाहिए। रासायनिक करो का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं करना चाहिए। क्योंकि रासायनिक खादों में  कार्सिनोजेनिक पदार्थ भी पाए जाते है जिनसे बचना बहुत जरूरी है । यूरिया  अथवा नाइट्रोजन का मोबिलाइजेशन हवा केथ होना चाहिए । मानव, जानवर, जंगल ,के लिए प्रतिशत के हिसाबसे खेती में जमीन का प्रयोग करना चाहिए।
3 , खेती को ब्रदरहुड अथवा भाईचारे की हैसियतस करनी चाहिए़ और इस बात का ध्यान रखना चाहिए की अगर हम रसायन युक्त खेती करेंगे तो वह रासायनिक पदार्थ हमारे ही खाएंगे तथा उनके दुष्प्रभाव से प्रभावित होंगे और बीमार होकर अस्पताल में जाएंगे। 
4, हमें अपनी स्थानीय मिट्टीसे उगाया हुआ खाना ही खाना चाहिए़।
5 बेमौसमी सब्जी तथा फल के प्रयोग के परहेज करना चाहिए। क्योंकि भी मौसमी सब्जियों में पेस्टिसाइड अधिक मात्रा में डाले जाते हैं। हाइड्रोपोनिक पौधों से प्राप्त फल तथा सब्जियां स्वास्थ्यके लिए लाभकारी नहीं होते हैं।
6, खाद्य पदार्थों को कई बार रासायनिक इंसेंटिसाइड से स्प्रे करके बेचा जाता है और वही सब्जी हम लोग कहते हैं जिससे हमारे शरीर में विभिन् प्रकार की बीमारियां  पैदा  होती है। इसके लिए किसने समाज के बीच जागरूकता पैदाकरनी पड़ेगी।
7क्लीन कल्टीवेशन गलत है। फसल अवशेषों को खेतों में
ही डालना चाहिए।
8, पानी का वाष्पन रोकने के लिय हमें मल्चिंग करनाचहिए । इसके लिए काऊ डंग आर्ककाऊ यूरिन आदि कई प्रयोग कर सकते हैं। 
9 इंटरक्रॉपिंग तथा क्रॉप रोटेशन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। तथा जूता ए बंद कर देना चाहिए।
10 एनिमल फीड भी हमारे फीड से ही आता है। पौधों तथा मिट्टी मैं दी(deadiction) करना चाहिए।
11,आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा दिया जाता है। जैविक इनपुट्स में विभिन्न प्रकार के मित्र कीट जिसमें पर भक्षी
क किट, परजीवी किट ,विभिन्न प्रकार की मकड़या , एंटोमोफागस इंसेक्ट्स, एनपीवी वायरस, विभिन्न प्रकार के खरपतवारों के लिए पाए जाने  फाइटोफागस इंसेक्ट्स, DD 136 nematodes,, विभिन्न प्रकार की एंटागनिस्टिकफंगी, आदि शामिल है । इनकी अनु उपलब्धता आईपीएम के क्रियान्वयन की प्रमुख बाधा है। इसीलिए किसान उपयुक्त मात्रा में खेती में नासिजीव नियंत्रण हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा नहीं दे पाते हैं क्योंकि इनके लिए कोई भी प्राइवेट उद्यमी इनके उत्पादन हेतु औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए इच्छुक नहीं  होते हैं जिसकी एक वजह जैविक नियंत्रण कारकों अथवा जैविक इनपुट्स की शेल्फ लाइफ अथवा स्वयं का जीवन बहुत कम होता है तथा इनका स्टोरेज अधिक समय तक नहीं किया जा सकता है। इन्हीं सब कारणों की वजह से किसान जैविक इनपुट की क्रियाशीलता पर अधिक विश्वास नहीं कर पाता तथा इनका प्रयोग भी नहीं करता है। यद्यपि सभी डेमोंसट्रेशंस में जैव नियंत्रण कारक की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। जैव नियंत्रण कारक कुछ विशेष नशीजेवोंके नियंत्रण में बहुत ही उपयोगी अथवा मददगार सिद्ध हो चुके हैं और कुछ नशीजीवों  के नियंत्रण के लिए कुछ अन्य रसायन रहित विधियों के साथ उपयोगी साबित हुए हैं। अतः आईपीएम  के क्रियान्वयन हेतु कृषकों को जैविक नियंत्रण कारकों को अन्य रसायन रहित विधियों के साथ प्रयोग करना चाहिए। जैविक नियंत्रण कारकों को प्राकृतिक खेती के इनपुट के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
12,

Thursday, April 9, 2026

डॉ सुभाष चंद्र इंटरव्यू से।

खेती किसानी की दुनिया बाहर से जितनी बोरिंग लगती हैअंदर से उतनी  ही द‍िलचस्प है.  इसमें राजनीत‍ि, अर्थशास्त्र और व‍िज्ञान का जबरदस्त कॉकटेल है. कृष‍ि और क‍िसानों को बचाने के ल‍िए कुछ ऐसे काम भी होते हैं ज‍िसकी आम आदमी कल्पना भी नहीं करता. सरकार अनाज और फल-सब्ज‍ियों का उत्पादन बढ़ाने के ल‍िए बड़े पैमाने पर उर्वरकों का आयात करती है. लेक‍िन, आपने ऐसी कल्पना कभी नहीं की होगी क‍ि कीटों का भी आयात होता है. आप सोचेंगे कीटों का आयात क्यों? कीट तो खतरनाक होते हैं? असल में सभी कीट खेती के ल‍िए खतरनाक नहीं होते. अगर कोई कीट भारतीय कृष‍ि के ल‍िए खतरा बनने लगता है तो सरकार उसे कंट्रोल करने के ल‍िए उनके मूल देश या क्षेत्र से उनके प्राकृतिक शत्रु कीटों को इंपोर्ट करती है. दुश्मन को उसके सामने लाकर खड़ा कर देती है. नेचर का बनाया यह एक ऐसा खेल है क‍ि खेती के ल‍िए खतरनाक कीटों के प्राकृत‍िक शत्रु कीट उन्हें साफ कर देते हैं या पौधों के रास्ते से हटा देते हैं. 

बहरहाल, साल दर साल कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है लेक‍िन न तो फंगस कम हुए, न कीट लगने कम हुए और न खरपतवारों की संख्या में कोई कमी आई।

Thursday, April 2, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट(आई पी एम)

          इंटीग्रेटेड पेस्ट मनेजमेंट (आई पी एम)
आईपीएम, नासि जीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है जिसमें नाशीजीव प्रबंधन एवं संपूर्ण कृषि तत्र के  सुचारूरऊप से क्रियान्वयन करनेकी सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करके फसल पारिस्थितिक तंत्र मैं पाए जाने वाले सभी नशीजीवों  की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखते हुए खाने योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का इस प्रकार सेउत्पादन किया जाता है कि कृषि उत्पादों का अधिकतम से अधिक तम विक्रय मूल्य प्राप्त हो सके तथा साथ साथ जमीन की उर्वरा शक्ति, सामुदायिक स्वास्थ्य, फसल पारिस्थितिक तंत्र,पर्यावरण, जैव विविधता , जीवन एवं जीवन के पंचमहाभूत क्षिति , जल पावक,गगन, समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों एवं  कृषकों  की आमदनी पर विपरीत प्रभाव ना पड़े तथा प्रकृति एवं समाज के बीच सामंजस्य स्थापित  हो सके। आईपीएम के क्रियान्वयन में रसायनों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किसी भी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतुCIB &RC के द्वारा प्रदान  की गई संस्तुति के अनुसार किया जाता है।
         प्राकृतिक खेती आईपीएम का ही एक सुधरा हुआ रूप है जिसमें रसायनों का प्रयोग बिल्कुल ही नहीं  कियाजाता है तथा जमीन की उर्वरा शक्ति, जैव विविधता, जीवन के पंच महाभूत क्षिति,जल, पावक गगन समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों, वर्षा जल के संरक्षण,को भी महत्व दिया  जाता है ।
      आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती का मुख्य उद्देश्य खाने के योग्य सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, एवं इकोलॉजिकल सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए जीडीपी पर आधारित विकास के साथ-साथ इकोलॉजिकल , इकोनॉमिकल, प्राकृतिक एवं सामाजिक विकास को महत्व दिया जाता है।
         खेती कोई भी हो वह प्रकृति और उसकी व्यवस्था के द्वारा संचालित होती है अथवा क्रियान्वित की जाती  है प्रकृति  को ही भगवान  कहा जाता हैं जिसका मतलब  होता है भू अर्थात जमीन, गगन अर्थात आकाश ,वायु  , अग्नि,नीर अर्थात पानी । जीवन के इन्हीं पंचमहाभूतों का सरक्षण करनेसे खेती के लिय बहुत जरूरी है ।

Wednesday, April 1, 2026

Production in Agriculture (From Green Revolution to Ever Green Revolution ,from food security to food and ecological safety,and from food quantity to food quality and Nutritional food.)

1,Production by masses not mass production. By Dr M S Swaminathan.
2, Production cost plus 50 %. MSP. Farmula by Dr MS Swaminathan
3,Sale price of Agri produce must  be fixed by the farmers not by the   Govt.
4, Agriculture is not respectable job.
,From cip to mouth.to right to food  stage.
5,We do not bargin in  in malls but we bargin with  the  farmers .
6, Enormous use of fertilizers to illogical use of water.
7 From Green Revolution to ever Green    Rrvolution.Sustainable Agriculture .
Wheat and Rice have become Commercial crops  due to Green Revolution. 
8, Refarming the policies  related with  Agriculture.
9,Nutrition intensive Agriculture.
10,Bengal Famine from 1942 to 19 46.Nearly 40 lakh people died  due to starvation.
10,We became  exporter of wheat and rice from importer quickly hence achieved Green Revolution. Our need was calory which got from wheat and Rice 
11, Are  we  producing nutritional  food? No.
    Nutritional value of our food was reduced.Nutrition is separated from Agriculture.We enhanced the production of food grains  but not the nutritive value.
12,We should maintain soil wth organic carbon and nutrition.We need to go towards Nutrition dense Agriculture for which we need to make farmers centric policies.
13,After ten years the quality of food will remain  suitable to eat or not.
14.Our stomach is filled that is why we are talking .
15 Green Revolution has played both positive as well as negative roles.It has enhance the tendency of illlihitimate use of inputs.storing of things eventhey are not needed.Green Revolution has enhanced the inhuman tendency or nature of man.Monopolization of technology is bad.
16 Wellfare of all must be our moto.



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