यह तकनीक अथवा टेक्नोलॉजी काम करेगी या नहीं इस प्रकार का भय कृषकों के बीच रहता है।
2, जीवन के पचो महाभूत अर्थात क्षति,( जमीन),पानी, पावक अर्थात अग्नि,गगन समीरा अर्थात हवा सारे संक्रमित और और प्रदूषित हो चुके हैं। हमारी जनरेशन ने ही इनको कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करके विषाक्त बना दिया है । सबसे पहले इन सभी तत्वों को प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है।उदाहरण के तौर पर पानी तथा मिट्टी की जांच करवाना चाहिए और उसके अनुसार पानी का पीएच तथा उसमें घुले हुए अन्य हानिकारक पदार्थ की जानकारी लेनी चाहिए इसी प्रकार मिट्टीक पीएच, उसमें जीवाश्म कार्बन की मात्रा तथा सक्ष्म
जीवों एवं सूक्ष्म तत्वों की जानकारी लेनीचहिए । इसके साथ-साथमट्टी में मौजूद रासायनिक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी भी लेनी चाहिए और उसकी के हिसाब से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन तथा ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए जीवामृत तथा घन जीवामृत को सिंचाई के साथ फसल की बुवाई से पहले पलावा के सथ डालना चाहिए। इसके लिए हरी खाद का प्रयोग भी करना चाहिए। रासायनिक करो का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं करना चाहिए। क्योंकि रासायनिक खादों में कार्सिनोजेनिक पदार्थ भी पाए जाते है जिनसे बचना बहुत जरूरी है । यूरिया अथवा नाइट्रोजन का मोबिलाइजेशन हवा केथ होना चाहिए । मानव, जानवर, जंगल ,के लिए प्रतिशत के हिसाबसे खेती में जमीन का प्रयोग करना चाहिए।
3 , खेती को ब्रदरहुड अथवा भाईचारे की हैसियतस करनी चाहिए़ और इस बात का ध्यान रखना चाहिए की अगर हम रसायन युक्त खेती करेंगे तो वह रासायनिक पदार्थ हमारे ही खाएंगे तथा उनके दुष्प्रभाव से प्रभावित होंगे और बीमार होकर अस्पताल में जाएंगे।
4, हमें अपनी स्थानीय मिट्टीसे उगाया हुआ खाना ही खाना चाहिए़।
5 बेमौसमी सब्जी तथा फल के प्रयोग के परहेज करना चाहिए। क्योंकि भी मौसमी सब्जियों में पेस्टिसाइड अधिक मात्रा में डाले जाते हैं। हाइड्रोपोनिक पौधों से प्राप्त फल तथा सब्जियां स्वास्थ्यके लिए लाभकारी नहीं होते हैं।
6, खाद्य पदार्थों को कई बार रासायनिक इंसेंटिसाइड से स्प्रे करके बेचा जाता है और वही सब्जी हम लोग कहते हैं जिससे हमारे शरीर में विभिन् प्रकार की बीमारियां पैदा होती है। इसके लिए किसने समाज के बीच जागरूकता पैदाकरनी पड़ेगी।
7क्लीन कल्टीवेशन गलत है। फसल अवशेषों को खेतों में
ही डालना चाहिए।
8, पानी का वाष्पन रोकने के लिय हमें मल्चिंग करनाचहिए । इसके लिए काऊ डंग आर्ककाऊ यूरिन आदि कई प्रयोग कर सकते हैं।
9 इंटरक्रॉपिंग तथा क्रॉप रोटेशन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। तथा जूता ए बंद कर देना चाहिए।
10 एनिमल फीड भी हमारे फीड से ही आता है। पौधों तथा मिट्टी मैं दी(deadiction) करना चाहिए।
11,आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा दिया जाता है जिसकी अनु उपलब्धता आईपीएम के क्रियान्वयन की प्रमुख बाधा है। इसीलिए किसान उपयुक्त मात्रा में खेती में नासिजीव नियंत्रण हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा नहीं दे पाते हैं क्योंकि इनके लिए कोई भी प्राइवेट उद्यमी इनके उत्पादन हेतु औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए इच्छुक नहीं होते हैं जिसकी एक वजह जैविक नियंत्रण कारकों अथवा जैविक इनपुट्स की शेल्फ लाइफ अथवा स्वयं का जीवन बहुत कम होता है तथा इनका स्टोरेज अधिक समय तक नहीं किया जा सकता है। इन्हीं सब कारणों की वजह से किसान जैविक इनपुट की क्रियाशीलता पर अधिक विश्वास नहीं कर पाता तथा इनका प्रयोग भी नहीं करता है। यद्यपि सभी डेमोंसट्रेशंस में जैव नियंत्रण कारक की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। जैव नियंत्रण कारक कुछ विशेष नशीजेवोंके नियंत्रण में बहुत ही उपयोगी अथवा मददगार सिद्ध हो चुके हैं और कुछ नशीजीवों के नियंत्रण के लिए कुछ अन्य रसायन रहित विधियों के साथ उपयोगी साबित हुए हैं। अतः आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु कृषकों को जैविक नियंत्रण कारकों को अन्य रसायन रहित विधियों के साथ प्रयोग करना चाहिए। जैविक नियंत्रण कारकों को प्राकृतिक खेती के इनपुट के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
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