Wednesday, February 18, 2026

आईपीएम हमारे हिसाब से

आईपीएम-नाशीजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र                        अथवा                पद्धति का एक समेकित                  प्रबंधन ।
नाशिजीव प्रबंधन
शर्त अथवा राइडर -फसल पारिस्थितिक तंत्र में  नशीजीवों                            की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के                             नीचे सीमित रखना। 
आर्थिक हानि स्टर-फसल पारिस्थितिक तंत्र में नशीजीवों की कम से कम वह संख्या जिसके ऊपर नासि जीव प्रबंधन की विधियों  को अपनाना आवश्यक होता है आर्थिक हानि स्टार कहलाता है। 
IPM- To get rid of from pest problems with minimum expenditure, minimum use of chemicals only to solve or to remove any pest emergency situation or without  use of chemicals with least  disturbance to life ,nature and society through adoption of all available , affordable and feasible methods of pest management or doing farming in compatible manner is called as Integrated Pest Management or IPM.
खेती करने की अथवा नासि जीव प्रबंधन करने की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करते हुए जिसमें रासायनिक विधियों का प्रयोग सिर्फ किसी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतु ही इस्तेमाल करते हुए कम से कम खर्चे में, रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए अथवा बिना प्रयोग किए हुए तथा जीवन, प्रकृति और समाज को कम से कम बाधित करते हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र में नशीजीवों  की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखना आईपीएम अथवा एकीकृत नासि जीव प्रबंधन कहलाता है।            आईपीएम, बीज से लेकर सुरक्षित फसल उत्पादों के उत्पादन,भडारण , विपणन तथा व्यापार व फसल उत्पादों के अंतिम प्रयोग , फसलअवशेषों का प्रबंधन
एवं अगली फसल की बुवाई की तैयारी तक की नाशिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा कृषि व्यवसाय या कृषि ऑक्यूपेशन के समेकित प्रबंधन की एक कार्य शैली, विज्ञान, दर्शन, आध्यात्म, समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र, टेक्नोलॉजी, प्रबंधन, योजना, नीति शस्त्र एवं विचारधारा है जिसमें कम से कम खर्चे में, रसायनों का कम से कम उपयोग करते हुए तथा प्रकृति, पर्यावरण ,समाज एवं जीवन को कम से कम बाधित करते हुए खेती करने की एवं वनस्पति संरक्षण करने की सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करते हुए जिसमें रासायनिक विधियों का प्रयोग सिर्फ अंतिम विकल्प के रूप में किसी आपातकाल स्थिति के निदान हेतु प्रयोग करते हुए ,खेतों में नाशिजीवों की संख्या को आर्थिक हानि स्तर के नीचे सीमित रखते हुए नाशिजीवों की समस्याओं से छुटकारा प्राप्त करने के साथ-साथ फसलों के उत्पादों का अधिक से अधिक उत्पादन एवं उनका अधिक से अधिकविक्रय मूल्य प्राप्त करने के साथ साथ खाने के योग्य सुरक्षित एवं पर्याप्त अथवा अधिकतम भोजन तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन किया जाता है आई पी एम कहलाता है । 
नासि जीव प्रबंधन के उद्देश्य :-
             Food Security along with food safety
            सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना, फसल उत्पादन मूल्य में कमी करना तथा अधिक से अधिक विक्रय मूल प्राप्त करते हुए खाने के योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन करना। 
उत्पादन लागत घटना, उत्पादन बढ़ाना, उत्पादन की गुणवत्ता एवं उनकी पौष्टिकता में सुधार लाना, मनुष्य तथा पशुओं को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से छुटकारा देना प्राकृतिक खेती तथा आईपीएम के मुख्य उद्देश्य है।
            सर्वे भवंतु सुखना, सर्वे संतु निरामया अर्थात इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव सुखी एवं निरोगी हो ।
     आज की खेती धन कमाने का विषय नहीं रह गया बल्कि अपना अस्तित्व बचाने का विषय बन गया है क्योंकि जमीन में जीवांश कार्बन 0.3 प्रतिशत ही रह गया है जो काम से कम एक परसेंट होना चाहिए । जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म होने के कगार पर आ गई है। भोजन जहरीला हो गया है। जमीन में पानी खत्म हो रहा है। जंगल खत्म होने से बरसात कम हो रही है। ग्रीनहाउस गैसेस के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है जिससे वातावरण का टेंपरेचर बढ़ रहा है।
फसल उत्पादन कैसे बढ़ाएं:-
             खेतोंमें अथवा मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन एवं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाते हुए ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना। जीवांश कार्बन को बढ़ाने हेतु खेतों में पशुओं के मल मूत्र , हरी खाद का प्रयोग तथा फसलों के अवशेषों का अच्छा दन करना । ह्यूमस से ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती के सिद्धांत के अनुसार खेती का कोई भी इनपुट बाजार से प्राप्त नहीं करना चाहिए।
जमीन में कार्बनिक पदार्थ डालना ना भूले। अभी हम प्रकृति को लूट कर धन बनाना चाहते हैं परंतु प्राकृतिक खेती एवं आईपीएम का उद्देश्य प्रकृति को स्ट्रांग बनाना है। अगर धरती में ह्यूमस , जीवांश कार्बन, पानी, फसल पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता आदि खत्म हो गई तो इंसान को कौन बचाएगा। आता है आगे की आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा हेतु जमीन तथा जीवन के पांच महाभूतों का प्रकृति में सरक्षण अवश्य करनाचहिए । किसानों के चेहरे पर मुस्कान तब आएगी जब कृषि उत्पादन लागत घटेगी, कृषि उत्पादों का अधिक मूल्य मिलेगा । शहरों में रहने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान तभी आएगी जब उनको बीमारियों से मुक्ति मिलेगी तथा उन्हें खाने के लिए रसायन मुक्त भोजन मिलेगा । और इसके लिए जमीन की उर्वरा शक्ति जैव विविधता जमीन में पानी ,जंगल, को विकसित करना पड़ेगा। जमीन में वभिन्न
 फलदार वृक्षों के साथ-साथ नीम के पेड़ भी लगाना चाहिए। प्रकृतिक खेती की विधियां:-
1, जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ते हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता, जैव नियंत्रण कारकों तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना तथा जमीन में जीवाश्म कार्बन एवं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाना ।
2, जल ,जमीन ,जंगल, जानवर अथवा जीव, जलवायु एवं जन का संरक्षण करना अथवा ध्यान रखना। 
3, जीवामृत एवं संजीवनी खाद को बनाना एवं प्रयोग करना।
4, इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग को अपनाते हए
 खेती करना। 
5, फसल अवशेषों को ना जलाना। 
6, रसायनों का इस्तेमाल न करना।
7, फसल उत्पादन लागत कम करना तथा  फसल उत्पादों की गुणवत्ता में सुधारना।
8, फसलों का विविधीकरण अथवा मल्टीकपिंग पद्धति अपनाना।
9, खेतों की चरों तरफ मेड बनाना तथा मेड पर पेड़ लगाना जो विभिन्न प्रकार के पक्षियों के बैठने के काम में आते हैं और यह पक्षी विभिन्न प्रकार के नशीजीवों के नियंत्रण में सहायक होते हैं।
10, खेतों में पशुओं के मल मत्र
 तथा फसलों के अवशेषों का आरक्षण करना। 
11, रासायनिक पेस्टिसाइड्स के स्थान पर जैविक पेस्टिसाइड्स का प्रयोग करना। 
12, खेतों में खेत जंगल बनाना। तथा एक फसल प्रणाली के सन परबहुफसली फसल उगाना। 
13, रासायनिक खादों के  स्थान पर हरी खादों को बढ़ावा देना।
14, पशुपालन को बढ़ावा देना प्राकृतिक खेती का एक मुख्य घातक है इससे पशु ऑन के द्वारा उत्सर्जित मलमूत्र खेतों मैं कार्बनिक पदार्थ के रूप मैं डाला जाता है जो सूक्ष्मजीवों के द्वारा भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है जिससे जीवांश कार्बन तथा ह्यूमंस की निर्मित होती है जो मिट्टी कीर्वरक शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता हैं।
प्राकृतिक खेती-प्रकृति की परस्पर्ता के साथ कदम ताल मिलाकर खेती करना प्राकृतिक खेती कहलाता है ।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार अथवा उसमें कुछ सुधार करके खेती करना प्राकृतिक खेती कहलाता है।
प्राकृतिक खेती प्रकृति में चलरही एक स्वचालित ( सेल्फऑरनाइज्ड), स्वयं सकय(सेल्फ एकव), स्वयं पोसी (सेल्फ नॉरिश्ड),स्वयं विकासी (सेल्फडवलपिंग), स्वयं नियोजित (सेल्फ प्लांड), सहजीवी(सिंबायोटिक) एवं आत्मनिर्भर (सेस्टैंड) फसल उत्पादन, फसल रक्षा, फसल प्रबंधन व्यवस्था पर आधारित तरीकों का अध्ययन करके उनसे संबंधित गतिविधियों को विकसित करके करकेकी जाती है। इस खेती का प्रमुख उद्देश्य प्रकृति के ससाधनों, जीवनके पंचमहाभूतों  क्षति,जल , पावक ,गगन, समीरा, का संरक्षण करते हुए कृषकों की आमदनीको बढ़ाना तथा भूमि की उर्वरक शक्ति कोभी बढ़ाना है। प्रकृति में नियम भी  है,नियंत्रण  भी है,और संतुलन भी है। प्रकृति अथवा प्राकृतिक खेती सहजीविता के सिद्धांत पर आधारित है। इस खेती में पूरकता, उपयोगिता, और समृद्धि का सिद्धांत लागू होता  है । इस खेती में मल्टी क्रॉपिंग करते हैं जिसमें एक फसल दूसरे फसल की मदद करती है । खेती में हमें उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन लागत भी कम करनी है। प्राकृतिक खेती
 या कोई अन्य खेती विज्ञान के साथ साथ हमारी सस्कृति है जिसमें खेती करने का तरीका किसानों ने अपने  पूर्वज किसानों से  करके  सीखा  है और आधुनिक कृषि पद्धति वैज्ञानिकों से सखी है। आधुनिक पद्धति एक क्रियान्वयन में विभिन्नपकारमें समस्याएं सामने आई है जिससे उनका क्रियान्वयन सुचारू रूप से कई बार नहीं हो सका तथा उसकी वजह से विभिन्न प्रकार के दुष्परिणाम भवि सामने आए हैं जिन्हेंदर करनाधि अति आवश्यक है।
 जीवामृत बनाने की विधि-
पानी                             200 lit
जंगल की जीवाश्म कार्बन 
 तथा सूक्ष्म जीवाणु युक्त मिट्टी 5 kg
गुड.                                 5kg
आटा.                                5kg 
15 दिनों के बाद फिर आटा         3 kg and Gud 3kg
10 दोनों के बाद आटा                 2 केजी एंड गुड2केजी
इसको एक पंजे की मदद से हर रोज हिलते हैं इस प्रकार से 5 महीने में 15 बार अच्छा और आटा डाला जाता है जिससे जीवामृत तैयार हो जाएगा। 20 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ के लिए पर्याप्त होता है। जीवामृत प्रयोग करते समय खेत में नमी होना बहुत आवश्यक है इसलिए कई बार जीवो अमृत का प्रयोग पलावा के समय करते हैं। इसके साथ-सा द खेत में फसलों के अवशेष तथा मल मूत्र का होनाभी बहुत आवश्यक है जो जीवाणुओं के भजन का काम करता है। 
घन जीवामृत बनाना:-
एक कुंटल सूखे पशुओं के गबर को गिला करके जीवामृत मिलकर धन जीवन अमृत बनाया जाता है यह भी पलावा के समय इस्तेमाल किया जाता है। 
संजीवनी खाद बनाना:-10 एकड़ के लिए 
ताज गोबर                  30 kg 
नीम के पत्ते।               30 केजी अथवा
नीम की निंबोली।           10 केजी अथवा 
आंकड़ा के पत्ते।              2ओ केजी अथवा 
तंबाकू के पत्ते।                  5 केजी 
गुड।                                3केजी 
पानी                                 63 केजी
सात आठ दिनों तक धूप में  रखें ।


 
  

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