Thursday, August 6, 2026

खेती का सच

      खेती  का सच,:-Agronomy :-भूमि एवं फसलों का ऐसा प्रबंधन जिसमें कृषकों के परिवार की हर जरूरत पूरी हो जए और भूमि की उर्वरता पर कोई  विपरीत्व प्रभाव न पड़े एग्रोनॉमी अथवा सस्य विज्ञान कहलाता है। ये तब की परिभाषा है जब हमारा देश सोने कीचिडिया कहलाता था ।जबकि उस वक्त हमारे पास कोई केमिकल फर्टिलाइजर्स ,पेस्टिसाइड,हाइब्रिड सीड्स ,पानी के संसाधन अर्थात बोरे बेल नहीं हुआ करते थे। खेती वर्षा पर निर्भर थी। खेती एनिमल्स विशेष तौर से बैल  पर निर्भर थी। बिजली नहीं थी ,ट्रांसपोर्ट के साधन नहीं थे । खेतों मैं मोटे अनाजों का उत्पादन किया जाता था । गेहूं का उत्पादनभी नहीं  था ।
ग्रीन  रिवोल्यूशन  के वक्त विभिन्न प्रकार के   हाइब्रिड सीड्स  , सिंचाई के सधान,रासायनिक उर्वरक  , ट्यूब वेल, ट्रैक्टर्स,आदि विकसित किये गये  जिससे हम खाद्यान्न  में  तो  निर्भर  हो  गये परंतु  रसायनों के  अंधाधुंध प्रयोग से जमीन,जैव विविधता ,प्रकृति और उसके संसाधनों  जीवन और जीवन के पांच महाभूतों,स्वास्थ्य,भू जल का स्तर जमीन  की उर्वरा शक्ति,भोजन  के  स्वाद,एवं जहरीले भोजन  ,जंगल के क्षेत्र में कमी आदि से  जुड़ें  हुए बहुत सारी समस्याएं एवं दुष्परिणाम सामने आए  जिससे समाज में बहुत  बीमारियां उभरने लगीं ।  जिस से  बहुत सारे नाशीजीवों की समस्याएं उभर कर सामने आयीं ,जमीन का जल स्तर  नीचे च ला गया। जलाशय  बंद हो गई , खेती बाजार पर आधारित होगयी अर्थात बाजार के द्वारा हाईजैक हो गई ।और फसल उत्पादों का उत्पादन मूल्य बढ़ गया। प्रकृति और उसके संसाधन  नष्ट हो गए ।जमीन मैं जीवांश कार्बन  कम हो जाने से जमीन  की उर्वरा शक्ति क्षीण  हो गई।उपरोक्त समस्याओं को ध्यान में रखते हुए अब एग्रोनॉमी की नवीन परिभाषा   इस प्रकार  से लिख सकते हैं।
भूमि तथा फसलों का वह प्रबंधन जिससे कृषक परिवार की हर जरूरत पूरी हो जाए और भूमि की उर्वरता, पारिस्थितिक तंत्र की सक्रियता, जैव विविधता, भूगर्भ  जल के स्तर,पर कोई विपरीप / प्रतिकूल प्रभाव  ना पड़े।,एग्रोनॉमी कहलाता 
 है।
 कॉमिकल तब छोड़ पाओगे  जब  भूमि की उर्वरता
 बढ़ाओगे ।
1,खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाकर। 2,वृक्षों के बगैर प्राकृतिक खेती नहीं हो सकती।3,वृक्ष एक ज्ञान है।4,वृक्षों से बायोडायवर्सिटी  बद्ती  है। 5, पशुओं के बगैर प्राकृतिक खेती नहीं हो सकती।6,फसल नहीं फसलें बोनी  चाहिए़। 7,खेती हम अपने लिय नहीं करते बल्कि आगे की  पीढ़ियों के लिय करते हैं। हमे खेती  परमार्थ लिय के लिए करनी है। खेती का मतलब बच्चों का भविष्य उज्जवल हो। यही प्राकृतिक खेती का मोटो है 7,भूजल स्तर को ऊपर करना ।8 कृषि जीवनका आधार है।8,जलसंरक्षण हेतु कृषकों  के पास तालाब होना चाहिए।9,आज अगर देश में गैस बंद हो जाए तो रोटी नहीं मिलेगी क्यों कि हमारेपास लकड़ी नही है जलने के लिए। स्वावलम्बी  भारत  स्वावलंबी   किसान  चाहिए़।
प्लान :- 1,बृक्ष ,पालतूपशु,फसल  विविधता,भूगर्भ स्तर  को ध्यान में रखना।
खरीफ,:- रोटी; ज्वार,,बाजरा,मक्का आदि।
डाल:- उर्दूं ,मूंग ,अरहर,
तेल :- मूंगफली ,सोयाबीन, तिल
चारा: हरा चारा,खली
 खेती आनंद ,खुशी , और जीवन का  विषय है ।
रबी:- रोटी:- गेहूं जौ ,चना ,मटर और  मसूर  
तेल:- राई अलसी
सब्जी:-
बृक्ष:- नीम ,शीशम,जामुन,सुबबूलाल  ,आम 
  बीच में :-  सृजन,पपीता,बांस मेड पर  नीबू 
बाग़ :- खरपतवार साफ नहीं कराना चाहिए
 जायद  :- कुकर्बिट्स  
कर्ज और मर्ज़ से मुक्ति
जीने दो और जिओ  
सर्वे भवन्तु सूखना ,सर्व  संतु नीरामया 
 दॉगले चरित्र के साथ खेती न करें।
प्राकृतिक खेती एक स्थाई  और स्वास्थजीवन है।
प्राकृतिक् खेती  से  हमे धन नहीं कमाना है बल्कि जीवन को बचाना है ।
प्राकृतिक खेती को इतना जटिल नहीं बनाना है कि करने में किसान ऊब जाय ।
 जय प्राकृतिक खेती