Saturday, June 27, 2020

टिड्डी दल के द्वारा टिड्डी चेतावनी संगठन के राष्ट्रीयमुख्यालय वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय फरीदाबाद को सलामी

यद्यपि 1993 मैं देश में सबसे बड़ा locust invasion  अर्थात दलों का हमला देखा गया था  l  जिसमें टिड्डी dalon locust swarms का आक्रमण  लगभग देश के अधिकांश प्रदेशों में हुआ था l परंतु उस समय भी दिल्ली और फरीदाबाद  तक locusts swarms  नहीं प्रवेश कर पाए थे l परंतु इस वर्ष  2020 मैं locust swarms का incursion  1993 के इन करसन से भी बड़ा देखा गया l टिड्डी दल ओ के कुछ भाग या छोटे छोटे दल जोकि बड़े टिड्डी दल के कई हिस्सों में बट जाने से बने दिनांक 26 जून 2020 को रेवाड़ी तक प्रवेश कर लिया था यह टिड्डी दल हवा के favourable  रुख अर्थात अनुकूल दिशा की ओर की वजह से दिनांक 27 जून 2020 को NCR  के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश कर गया और वह फरीदाबाद मैं स्थित  वनस्पति संरक्षण संगरोध एवं संग्रह निदेशालय  जोकि टिड्डी चेतावनी संगठन का राष्ट्रीय मुख्यालय है को सलामी देता हुआ फरीदाबाद के सेक्टर 28 तथा नहर पार करके नोएडा की तरफ प्रवेश कर गया l टिड्डी दलों का नियंत्रण वैसे तो अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्र मैं ही  टिड्डी चेतावनी संगठन के द्वारा कर लेना चाहिए परंतु कई बार लगातार टिड्डियों के swarms  के देश में प्रवेश करने की वजह से अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्र में छुट्टियों का संपूर्ण नियंत्रण नहीं हो पाता है और वह दूसरे फसली इलाकों में चली जाती हैं या प्रवेश कर जाते हैं इस बार भी ऐसा ही हुआ l इस बार एनसीआर में प्रवेश करने वाला टिड्डी दल लगभग 10 किलोमीटर लंबा और करीब 6 किलोमीटर चौड़ा था ऐसी जानकारी मुझे समाचार पत्रों के द्वारा प्राप्त हुई l दोस्तों जो आपदा आती है उसका नियंत्रण भी होता है और वह चली भी जाती है परंतु वह हमारे लिए बहुत सारी सीख छोड़  जाती  है l टिड्डी दलों का भारत के विभिन्न राज्यों में आक्रमण तथा दिल्ली व एनसीआर के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश होना हमें यह सीख देता है कि हमें किसी भी हानिकारक जीव या pest  को कभी कम नहीं आंकना चाहिए जबकि टिड्डी तो एक अंतर राष्ट्रीय अथवा अंतर महाद्वीपीय हानिकारक जीव है जिसका प्रकोप कई बार भीषण दुर्भिक्ष या अकाल पैदा कर सकता है l  इस वर्ष का और 27 जून 2020 का locusts swarms राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में प्रवेश हमें यह सीख देता है कि  हमें लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन को हमेशा सभी रिसोर्सेज के  सहित   टिड्डियों के अचानक होने वाले आक्रमणों से निपटने के लिए 24 घंटे तैयार रहना या रखना चाहिए इसके लिए लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन मैं सभी पोस्टों को हमेशा भरा रहना चाहिए तथा लोकस्ट की गतिविधि के शिथिल रहने के दौरान लोकस्ट का सघन सर्वेक्षण तथा लोकस्ट नियंत्रण के मॉकअप एक्सरसाइज करते रहना चाहिए l इसके साथ साथ लोकस्ट नियंत्रण में प्रयोग किए जाने वाले सभी यंत्रों एवं उपकरणों एवं गाड़ियों की मरम्मत तथा सर्विस होती रहनी चाहिए l 27 जून 2020 के दिन लोकस्ट का एनसीआर में प्रवेश करके लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय हेडक्वार्टर या मुख्यालय वनस्पति संरक्षण संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के नजदीक से टिड्डियों का निकल जाना उन सभी अधिकारियों कर्मचारियों को यह सीख देता है कि  locust warning organisation  का का समय-समय पर सुदृढ़ीकरण एवं आधुनिकीकरण टिड्डी नियंत्रण मशीनों गाड़ियों ,communication equipments की मरम्मत एवं रिक्त हुए पदों भरना एवं लोकस्ट इमरजेंसी से निपटने के लिए प्रतिवर्ष विस्तृत आकस्मिक योजना जिसमें आपातकालीन फंड या  मद का भी प्रावधान हो ठीक उसी प्रकार से करते रहना चाहिए जिस प्रकार से हम अपनी भारतीय सेना को हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए करते हैं लोकस्ट वार्निंग ऑर्गेनाइजेशन एक प्रकार की पैरा डिफेंस ऑर्गेनाइजेशन की तरह कार्य करती है और लोकस्ट इमरजेंसी के दौरान युद्ध की तरह लोकस्ट इमरजेंसी को नियंत्रित करती है इसके लिए वह सभी सुविधाएं होनी चाहिए जोकि डिफेंस सिस्टम में होती हैl  लोकस्ट की आपत्ती इमरजेंसी को कभी कम नहीं आंकना चाहिए l यद्यपि लोकस्ट एक रेगुलर pest नहीं है l परंतु वह अचानक कभी भी इमरजेंसी के रूप में उभर कर आ सकता है जिसके लिए हमें हमेशा 24 घंटा तैयार रहना पड़ेगा l जिस प्रकार से हमारी तीनों सेनाएं युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहती हैं चाहे युद्ध ना भि हो युद्ध हमेशा नहीं होते हैं परंतु हमारी सेनाएं हमेशा किसी भी आपत्ति काल के लिए युद्ध झेलने के लिए तैयार रहती है l  locust warning organisation  को  कम   समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी l देश को भुखमरी से बचाने के लिए locust warning organisation का सुदृढ़ीकरण एवं आधुनिकीकरण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए l

Friday, June 26, 2020

IPM के क्रियान्वयन हेतु आईपीएम के कार्यक्षेत्र में बदलाव करें

आईपीएम के क्रियान्वयन तथा बढ़ावा देने के लिए हमारे व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर हमें आईपीएम के कार्य क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करना चाहिए यह परिवर्तन निम्न प्रकार से है l
1. कृषकों की रसायनिक कीटनाशकों तथा रासायनिक उर्वरकों को वरीयता पूर्वक प्रयोग करने वाली मानसिकता मैं बदलाव लाना तथा  रसायनिक कीटनाशकों के  वरीयता  पूर्वक इस्तेमाल के स्थान पर जैविक कीटनाशकों के इस्तेमाल को वरीयता पूर्ण बनाना l
2. फसल उत्पादन एवं फसल सुरक्षा मैं प्रयोग किए जाने वाले जैविक तथा ऑर्गेनिक इनपुट की उपलब्धता कृषकों के द्वार पर सुनिश्चित करना l
3 . फसल पारिस्थितिक तंत्र में पाए जाने वाले सभी लाभदायक जीवो का फसल पारिस्थितिक तंत्र में संरक्षण करना l
4  प्रकृति मैं पाए जाने वाले तथा चल रहे फसल उत्पादन या प्लांट प्रोडक्शन एंड प्रोटक्शन सिस्टम का अध्ययन करना तथा    उक्त अध्ययन के आधार पर उपयुक्त लाभकारी फसल चक्र अपनाकर पर  प्रति इकाई एरिया में  अधिक से अधिक फसल उत्पादन करना l
5. रसायनिक कीटनाशकों एवं रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से नष्ट हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र का पुणे स्थापन करना l
6.  कृषकों के द्वारा बनाई जाने वाली पुरानी पारंपरिक कृषि उत्पादन एवं कृषि रक्षा की विधियों का  validation  करना तथा उनको आईपीएम पैकेज में भविष्य में प्रयोग हेतु शामिल करना l
7. कृष को मे रसायनिक कीटनाशकों के प्रयोग की लगी हुई लत को दूर करना l
8.  Biological and organic IPM  inputs  के उत्पादन हेतु उत्पादन इकाइयों तथा उद्योगों का सरकार के द्वारा स्थापन करना l
9  मिट्टी की गुणवत्ता की जांच करके उसके गुणवत्ता के आधार पर  सूक्ष्म जीवों एवं सूक्ष्म तत्व की आवश्यकता के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करके उनका संरक्षण करना l
10. किसानों के द्वारा प्रयोग की जाने वाली फसल उत्पादन एवं फसल सुरक्षा की समाज  व  प्रकृति हितेषी  methods का संकलन करना , उनका वैलिडेशन करना तथा उनको लोकल आईपीएम पैकेज आफ प्रैक्टिसेज में शामिल करना



Wednesday, June 24, 2020

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंटकृषकों की मानसिकता परिवर्तन की एकविचारधारा है

IPM integrated pest management is a concept of change of pro chemical pesticidal Mind set of the farmers and people to non pesticidal or biopesticidal  mindsets. अर्थात कृषकों की  वरीयता पूर्वक रसायनिक कीटनाशकों के प्रयोग की जाने वाली मानसिकता में बदलाव लाकर तथा रसायनिक कीटनाशकों के स्थान पर  जैव कीटनाशकों को वरीयता पूर्वक  प्रयोग करना आई पीएम का प्रथम कार्यक्षेत्र होना चाहिए l इसके साथ साथ कृष को में सामुदायिक स्वास्थ्य ,पर्यावरण, जैव विविधता , प्रकृति व उसके संसाधन तथा समाज के प्रति सहानुभूति रखने वाली मानसिकता को भी विकसित करना भी आई पीएम का प्रमुख कार्य क्षेत्र होना चाहिए l  आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु मानसिकता परिवर्तन का प्रथम स्थान होता है l इन चीजों का ध्यान में रखते हुए जब हम खेती करते हैं तभी हम उसको आईपीएम खेती कहते हैं lअक्सर  यह देखा गया है 30 30 35 35 साल से आईपीएम तकनीकी का कृषकों के बीच में प्रदर्शन या demonstration के बावजूद भी तथा उनको जागरूक तथा प्रेरित करने के बावजूद भी किसान भाई आईपीएम अपनाने में विशेष रूचि नहीं रखते हैं  l क्योंकि उनका ध्यान सिर्फ पैदावार बढ़ाने तथा खर्चे को कम करने की तरफ होता है और वह पर्यावरण  , प्रकृति तथा समाज की ओर विशेष ध्यान नहीं देते हैं lजैव कीटनाशकों या जैविक इनपुट की उपलब्धता का ना होना भी एक कारण है  आईपीएम को प्रचलित  yah popularise  ना होने का l
       यह भी देखा गया है कि कुछ समझदार कृष को मैं मानसिकता परिवर्तन आ गया है और वह रसायनिक कीटनाशकों के प्रयोग को कम करने के पक्ष  मैं अपनी विचारधारा को परिवर्तित करके रसायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करने में अपनी रुचि लगाने लगे हैं तथा इनके स्थान पर वह जैविक खाद yeah जैविक उर्वरक तथा जैविक कीटनाशकों के प्रयोग को बढ़ावा देने लगे  हैं l कृषकों की मानसिकता में परिवर्तन लाना आई पीएम का आज के समय में अति आवश्यक है जब तक कृषकों एवं उपभोक्ताओं के मन में यह विचार नहीं आएगा कि हमें जहरीले कृषि उत्पाद नहीं पैदा करने चाहिए और ना ही उन्हें खाना चाहिए तब तक किसान भाई रसायनिक कीटनाशकों तथा उर्वरकों का खेती में प्रयोग करना कम नहीं करेंगे आता है इसके लिए यह परम आवश्यक है कि कृषकों की मानसिकता में परिवर्तन किया जाए l एक बार यदि मानसिकता में परिवर्तन आ गया तो methods या विधियां किसान भाई अपने अनुभव के आधार पर स्वयं भी विकसित कर लेंगे l यह भी अनुभव किया गया है कि किसान अपने दूसरे किसान के द्वारा अपनाई जाने वाली विधियां का अनुकरण जल्दी करता है बजाय कि वह विधियां जो कि सरकारी कार्यकर्ताओं के द्वारा प्रदान की जाती है l कृषकों की मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए हमें उनके दिमाग में यह यह डालना पड़ेगा या स्पष्ट करना पड़ेगा की रासायनिक कीटनाशक हमारे खेतों में पैदा होने वाले फसलों के उत्पाद को जहरीला बनाते हैं तथा वह हमारे शरीर ,पर्यावरण प्रकृति और वातावरण के लिए अत्यंत हानिकारक होते हैं l अतः हमें इनका उपयोग खेतों में कम से कम करना चाहिए जिससे हमारा , हमारे बच्चों का  तथा समाज के अन्य लोगों का स्वास्थ्य ठीक रह सके तथा समाज को रहने लायक उपयुक्त पर्यावरण मिल सके l हमें कृषकों को यह भी स्पष्ट करना पड़ेगा की फसल पर्यावरण में पाए जाने वाले सभी जीव हानिकारक नहीं होते हैं तथा उनमें से अधिकांश लाभदायक होते हैं जिन की सुरक्षा करना तथा उनकी संख्या को बढ़ावा देना और संरक्षण करना भी हमारा परम कर्तव्य है l यह लाभदायक जीव फसल पारिस्थितिक तंत्र को सुचारू रूप से चलाने में सहायक होते हैं तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में मददगार होते हैं l इसके अलावा फसलों में परागण की क्रिया होने में भी सहायक होते हैं जिससे फसलों में फल बनते हैं और हमें अनाज तथा फल प्राप्त होते हैं l मानसिकता परिवर्तन हेतु हमें कृषकों में प्रकृति समाज प्राकृतिक संसाधनों तथा पारिस्थितिक तंत्र के प्रति सहानुभूति रखने की मानसिकता को विकसित करना पड़ेगा तभी हम एक स्वस्थ  एवं समृद् समाज की स्थापना कर सकते हैंl हमें किसानों के मन में यह चेतना जागृत करनी होगी कि उन्हें रसायन युक्त जहरीले खाद्य पदार्थों का उत्पादन नहीं करना चाहिए और ऐसा करना मानवता के लिए अपराध है एवं धार्मिक दृष्टि से पाप है ऐसी भावना के साथ जब खेती करेंगे तो उनके मन में रसायनिक कीटनाशकों के प्रयोग को कम करने की भावना जागृत  होगी  l इसी समय हमें कृषकों को आईपीएम इन पोस्ट या ऑर्गेनिक इन पोट्स के उपलब्धता को भी सुनिश्चित करना पड़ेगा इसके लिए आईपीएम इनपुट के बनाने वाली विधियों को सरल करके किसानों के गांव में ही आई पीएम  inputs  का उत्पादन करना पड़ेगा l जिससे इनका उपयोग कृषि उत्पादन एवं  फसल सुरक्षा हेतु आसानी से कर सकें l

Monday, June 22, 2020

कृषि प्रचार एवं प्रसारकार्यकर्ताओं से कृषकों की अपेक्षाएंतथा आमदनी बढ़ाने हेतुकैसी हो खेती करने की व्यवस्था

 दोस्तों  ,अक्सर देखा गया है कि जब हमारे कृषि प्रचार एवं प्रसार कार्यकर्ता कृषकों के बीच किसी नवीनतम तकनीक को बताने के लिए जाते हैं तो वह कृषि के किसी एक विषय में एक्सपर्ट या निपुण होते हैं तथा पारंगत भी होते हैं, परंतु कृषकों की अपेक्षाएं कुछ और होती है l कृषक जिनको खेती के विभिन्न पहलुओं का भली-भांति ज्ञान होता है ,वह कृषि के विभिन्न विषयों का ज्ञान रखते हैं l वह कीट विज्ञानी  ,पौधा रोग विज्ञानी ,एग्रोनॉमिस्ट, हॉर्टिकल्चरिस्ट ,पशुपालन विज्ञान आदि सभी प्रकार का ज्ञान रखते हैं l जबकि हमारे एक्सटेंशन वर्कर सिर्फ किसी एक विषय का ज्ञान रखते हैं l ऐसे में कृषकों की अपेक्षाएं होती है कि वह प्रचार एवं प्रसार कार्यकर्ता उनकी समस्त खेती से संबंधित तथा सामाजिक, आर्थिक व्यापारिक, बाजार की आदि सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर दें l और एक एक्सटेंशन कार्यकर्ता में यह सभी प्रकार के गुण होना चाहिए जिससे कि वह कृषकों को संतुष्ट कर सके l परंतु व्यक्तिगत, व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं होता है lऐसे में प्रचार एवं प्रसार कार्यकर्ता उचित तकनीकी तथा अन्य विभागों से लगातार समन्वय एवं सहयोग रखने से इस प्रकार का ज्ञान कृषि प्रचार एवं प्रसार कार्यकर्ताओं मैं पैदा किया जा सकता है l जिससे वह कृषकों के बीच जाकर के उनकी अधिकांश समस्याओं का निवारण कर सकें l
          आज की कृषि व्यवस्था तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की कृषि व्यवस्था में जमीन आसमान का अंतर  है l इसी प्रकार से आज की खाद्य व्यवस्था , खाद्य सुरक्षा पहले की खाद्य व्यवस्था एवं खाद्य सुरक्षा से  भिन्न है l उचित खाद्य  व्यवस्था को स्थापित करना ,खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना तथा इन दोनों  की निगरानी करना एवं इनमें समय अनुसार वांछित परिवर्तन करना  सतत विकास की आवश्यकता है l आज की खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य व्यवस्था को स्थापित करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हम हम भूखे थे जबकि आज आज हम खाद्य व्यवस्था के बारे में  पूर्ण रूप से  स्वयं पर आश्रित है  तथा आज हम हम पूरे विश्व को चावल एवं सब्जियां खिला रहे हैं यानी निर्यात कर रहे हैं l इसी प्रकार से आवश्यकता अनुसार हमें कृषि उत्पादन की तकनीक तथा कृषि रक्षा या फसल सुरक्षा की तकनीक मैं परिवर्तन करना चाहिए l
कैसी हो आमदनी बढ़ाने तथा सुरक्षित खेती करने की व्यवस्था:---------
          आज  के सामाजिक ,आर्थिक, प्राकृतिक ,पर्यावरण के परिपेक्ष में एवं परिदृश्य में कृषि उत्पादन एवं फसल सुरक्षा या आईपीएम की विचारधारा पर्यावरण ,प्रकृति एवं समाज हितेषी ,लाभकारी ,मांग पर आधारित होने के साथ-साथ सुरक्षित ,स्थाई ,रोजगार प्रदान करने वाली ,व्यापार को बढ़ावा देने वाली तथा आय को बढ़ाने वाली ,समाज ,प्रकृति व जीवन के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली तथा जीवन की राह को आसान बनाने वाली होनी चाहिए तथा जीडीपी पर आधारित विकास के साथ-साथ सामाजिक ,प्राकृतिक, पर्यावरण, पारिस्थितिक तंत्र ,के विकास को करने वाली तथा कृषि कृषि श्रमिकों के जीवन के स्तर को सुधारने वाली होनी चाहिए l आज की फसल उत्पादन एवं फसल सुरक्षा तथा आईपीmकी विचारधारा उपरोक्त विचारधाराओं एवं आवश्यकताओं को  साथ में  ध्यान में रखकर उचित परिवर्तन करना चाहिए जिससे हम फसल सुरक्षा साथ साथ समाज ,प्रकृति एवं पर्यावरण  को भी सुरक्षा प्रदान कर सकें l उपरोक्त आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी खेती उत्पादन व्यवस्था और फसल सुरक्षा को निम्न प्रकार से परिवर्तित करने की आवश्यकता  है l
1. लाभदायक फसल चक्र अपनाना
2  खेत में प्रति यूनिट एरिया से अधिक से अधिक आर्थिक लाभ लेना
3. क्षतिग्रस्त फसल पर्यावरण तंत्र या फसल पारिस्थितिक तंत्र को  पुनर्स्थापित करनl l
4. जीरो बजट पर आधारित खेती करना अर्थात खेती में काम आने वाले inputs  की उपलब्धता को कृषकों के घरों एवं खेतों के पर्यावरण से ही सुनिश्चित करना l
5. फसल उत्पादन मैं की जाने वाली सभी गतिविधियों एवं खर्चा का लेखा जोखा रखनl l
6. रसायनिक  inputs के स्थान पर  जैविक inputs  को बढ़ावा देना तथा इनका उत्पादन एवं उपलब्धता स्थानीय स्तर पर कृषकों के मध्य उनके घरों से अथवा फसल के पर्यावरण से ही प्रदान करना l
7. सफल कृषकों के अनुभव को फसल उत्पादन पैकेज में शामिल करके कृषकों की आमदनी बढ़ाना l
8. हरित क्रांति को हरित रखना  l  अर्थात प्रकृति समाज  ,जैव विविधता , सामुदायिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखते हुए सुरक्षित फसल उत्पादन करना
9. उपरोक्त विचारधारा के अनुसार फसल उत्पादन करने की कृषकों के मन में मानसिकता उत्पन्न करना   या  समझ विकसित करना एक प्रमुख गतिविधि होनी चाहिए  l
10 . प्रकृति की उत्पादन व्यवस्था का अध्ययन करके किसी विशेष स्थान के लिए उचित एवं लाभकारी फसल चक्र ढूंढना या छांटना और उस फसल चक्र के अनुसार फसलों को बोना तथा उनसे वांछित मुनाफा प्राप्त करना l
10. प्रकृति में एक ही स्थान पर एक समय में कई प्रकार की फसलें या पौधों का उत्पादन करने की व्यवस्था है इस सिद्धांत को हमें भी क्लाइमेटिक जोन या मौसमी जो उनके आधार पर अध्ययन करना चाहिए तथा उसी प्रकार से फसलों उत्पादित करके लाभ उठाना चाहिएl
11. प्रकृति की उत्पादन व्यवस्था को अनुसंधान यार रिसर्च अथवा शोध शिक्षा नीति सभी स्तर पर समझने एवं देखने की जरूरत है और  उसके अनुसार उचित फसल चक्र से फसलें उत्पादन करना चाहिए l
12. फसलों का उत्पादन करना ही एकमात्र  आमदनी बढ़ाने का साधन नहीं होता है बल्कि  कृषि उत्पादों का विपणन करना उनकी गुणवत्ता को बढ़ाना संग्रह करना उनको प्रोसेस करके उनके और दूसरे उत्पाद बनाना तथा उनको अधिक दामों पर बेचना भी आमदनी बढ़ाने का जरिया या साधन होता है इन उत्पादों का सर्टिफिकेशन करके निर्यात करना आमदनी बढ़ाने का एक जरिया होता है l
13. खेती बजट से नहीं समझ से होती है l जैविक खेती - खेती करते समय खेती में प्रयोग की गई सभी गतिविधियों एवं खर्चों का लेखा जोखा रखकर खेती करने का तरीका  हैl इसके लिए खेती करने से पूर्व खेती करने का कंप्लीट वर्क प्लान तैयार कर लेना चाहिए और उसके साथ साथ detailed DPR भी करना l जैविक खेती अकाउंटेबिलिटी तथा अकाउंट रखने के आधार पर खेती करने का तरीका है l जैविक खेती वह तरीका है जिसमें समाज का हिस्सा ज्यादा मेहनत का हिस्सा उससे कम और बजट का हिस्सा जीरो के बराबर होता है इसके लिए सही समय सही बीच सही बीज शोधन सही फसल चक्र खत बाद खरपतवार ओं का नियंत्रण तथा फसल के अवशेषों से ही हाथ बनाना पड़ता हैl इससे फसल लागत शून्य के बराबर तथा गुणवत्ता युक्त फसल उत्पाद पैदा होते हैंl
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 स्थापित करना