Sunday, May 31, 2026

विभिन्न प्रकार की खेती की पद्धतियां

          विभिन्न प्रकार की खेती की पद्धतियां
1,Traditional Farming. पारंपरिक खेती:-
यह एक प्रकार की कृषिपदति है जो सदियों से चली आ रही है जब हमारे देश के पास सिंचाई के साधन रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक, हाइब्रिड सीड्स,, तथा आधुनिक कृषि यंत्र नहीं होते थे तथा खेती पूर्ण रूप से मानव श्रम, पशु शक्ति, प्राकृतिक वर्षा, तथा पशुओं के मल मूत्र पर आधारित उर्वरक उर्वरकों, आदि पर आधारित होती  थी। इसमें देसी बीज प्रयोग किए जाते  थे । यह खेती परिवार के सदस्यों के द्वारा तथा पुराने तरीके के कृषि  यंत्रों का प्रयोग कर के  की जाती थी । इस प्रकार की खेती में जमीन के अंदर जीवाश्म कार्बन भरपूरमत्रा में होता था । इस प्रकार की खेती मैं स्थानीय बीजों  का प्रयोग किया जाता था। यह खेतीजीवन निर्वाह  के लिए की जाती थी। जो पूर्ण रूप से वर्षा परआधरित होती थी।
2,रासायनिक खेती:-यह कृषि की एक ऐसी पद्धति है जिसमें फसलों की पैदावार तेजी से  बढ़ाने के लिए तथा उन्हें कीटों आदि से बचाने के लिया कृतिम रसायनों ,रासायनिक उर्वरको,कीटनाशकों ,तथा खरपतवार नाशकों का भारी मात्रा में उपयोग कियाजत है।
3,एकीकृत नाशिजीव प्रबंधन पर प्राधारित खेती:-
इस प्रकार की खेती मैं कम से कम खर्चे में, फसल उत्पादन एवं नासि जीव प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, ऑर्गेनिक खेती,  इकोफार्मिंग , तथा परमा कल्चर आदि की विभिन्न  विधियों  एवं गतिविधियों को समेकित रूप से प्रयोग करके  फसल पारिस्थितिक तंत्र में पाए जानेवाले नाशिजीवों की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखा जाता है। इस प्रकार की खेती मैं  रसायनों  का उपयोग सिर्फ किसी आपातकाल स्थिति के निपटान हेतु अंतिम विकल्प के रूप मैं इस प्रकार से किया जाता है कि जीवन, प्रकृति ,पर्यावरण, और समाज के क्रियाकलाप बाधित ना हो और गुणवत्तायुक्त  कृषि उत्पादों का भरपूर उत्पादन के साथ अधिक से अधिक विक्रय मूल्य प्राप्त हो सके।
4 जैविक  खेती  अथवा ऑर्गेनिक खेती:- बिना रसायनों के की जानेवाली खेती को ऑर्गेनिक खेती कहते हैं।इसप्रकारकी  खेती में जैविक उर्वरक,जैविक कीटनाशक,जैविक खाद  जैसे हरी खाद   केंचुआ खाद ,या तो घर पर बनाकर या बाजार से खरीदकर प्रयोग की जाती है।इस प्रकार की खेती में रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता है।इसमें भी स्थानीय इनपुट का प्रयोग किया जाता है। इस खेती मैं जेनेटिकली मोडिफाइड सीड्स का भी प्रयोग नहीं किया जाता है।
5,Biodynemic kheti :खेत को जिंदसमझा जाएगा,स्वस्थ मृदा उत्पन्न करें,मानवता का पोषण करे ,प्रकृति के बहाव मैं चलती है,नक्षत्रों की गति पर चलती है।
6,नेचुरल फार्मिंग:पराकृतिक खेती 
     Local ecosystem ke tahad sabhi components  shamil karein .
Tree,crops,animals biodiversity,ko samil karte huy kheti karain,No tillage.
Natural farming is an improved version of IPM in which no chemical is used and farming is done by improving the fertility of soil, conserving Natural resources and conserving Natural resources and Panch mahabhootas of life.
7,Ecofarming :-  Treat the  soilnot the plant.Enhance the population of microorganisms.It is the combination of modern and traditional practices /approaches.
8,Permaculture:- It is also Traditional and modern approach.
9,Zero budget Naturally Farming:- By Subhash Paaleker.
, किसी भी इनपुट की कीमत नहीं लगानी है । सभी इनपुट्स  को किसानों के खेतों पर ही तैयार करना है। छोटे किसानों के लिय यह सबसे अच्छी खेती है। इसमें कोई भी रसायन तथा GMOS प्रयोग नहीं किए जाते हैं। बीज और खाद घर पर ही बनाएं जाते हैं।


Friday, May 29, 2026

Themes of different types of Agricultural System.

 Themes of different types of Agricultural System.
1. खाने योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन।
Production of  safe food to eat and quality Agricultural products to trade.
2, खाने योग्य सुरक्षित भोजन के साथ साथ खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना।
To ensure food security along with food 
safety.
3, पारिस्थितिकतत्र एवं कृषि को साथ साथ लाएं।
 Bring Ecology and Agticulture together 
4, प्रकृति और उसके संसाधनों तथा जीवन और उसके पांच महाभूतों  की सुरक्षा एवं संरक्षण करें। 
Let's conserve and protect  the nature and it's resources and Five elements of life..
5, खेती को धीरे-धीरे रसायन रहित लाभकारी एवं किफायती बनायें।
   Let's make Agriculture Chemical less, economicnl land profitabl. , slowly slowly ..
6, जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाएं। 
   Let's enhance fertilityof soil.
7, विकास को विनाशकारी ना बनाया जाए। 
Let's not make development. Catestrpic in nature.
8, आईपीएम एक प्रकार का जैव पारिस्थितिक एवं किफायती  अप्रोच है।IPM is a bioecological,and ecomic approach of pestmsnagement.
8 आईपीएम तथा अन्य किसी भी प्रकार की कोई भी कृषि की वचारधारा  की देखभाल जमीन के नीचे से प्रारंभ करनी चाहिए ना की फसल से। 
Let's start care of farming from basement of soil not from above the ground or plants.
9,

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Elements of Permaculture

Elements of Permaculture
1,Observe and interact.
2,Do not create wastes
3,Design the field.
4,Biofencing  like Bamboo fencing./Border fencing.
5,Farm house  with water sources.
6, Different zones of crops ,
7,Do not go to the market for puchaseng the inputs.Make inputs  and seeds at field itselves.
8 Multicropping  or  Joint  Family.
9, Water  and soil conservation.,
10,To enhance caor on contents in Soill
11,Farming as an Agribusiness and farmers as Enreprenure.
12.Cattles as a component of Farming.
12



Sunday, May 24, 2026

प्राकृतिक खेती और परमा कल्चर

         प्राकृतिक खेती और परमा कल्चर 
जैसा कि मैने पहले यह बताया था कि प्राकृतिक  खेती आईपीएम का ही एक सुधरा हुआ रूप है जिसमें रसायनों का उपयोग बिलकुल  ही नहीं किया जाता है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के प्रयासो के साथ जैवविविधता,प्रकृति के  संसाधनों तथा जीवन के पंच महाभूतों  क्षिति,जल, पावक( अग्नि),गगन(स्काई) समीरा(वायु) का  सरक्षण  तथा कृषकों की आमदनी अथवा आय को बढ़ाने का भी प्रयाश किया जाता है तथा जल,जमीन ,जंगल,जानवर ,जन ,तथा  जमीन मै पाये जानेवाले,माइक्रूर्गनिज्म्स एवं जीवांश कार्बन तथा ह्यूमस का संरक्षण एवं रक्षा की जाती है। इसके लिए खेतों के चारों तरफ चौड़ी चोंडी मेड तथा मैंड प र र्पेड लगाए जातेहै एवं खेतों का समतलीकरण किया जाता है जिससे खेती के लिए आवश्यक तत्व  बहकर दूसरे खेत मैं ना जाने पाए , खेतों मैं जीवाश्म कार्बन, बढ़ाने हेतु जानवरों के मलमूत्र तथा खेतों मैं पाय जाने वाले खरपतवारों एवं  फसलें के 
 अवशेषों का र्खेतों  ही आच्छादन  किया जाता है। जिससे जमीन की  नमी एवं उर्वरा शक्ति बढ़ती  है । इसी प्रकार से  खेतों में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाने हेतु जीवामृत  का प्रयोग किया जाता हैऔर नशीजीवों के नियंत्रण हेतु जन्तुओं तथा वनस्पतियों पर आधारित नशीनीव नाशकों  का प्रयोग किया जाता है।
ठीक इसी प्रकार से    पर्माकल्चर भी प्राकृतिक खेती का एक सुधारा हुआ रूप है। शब्द  परमआ कल्चर परमानेंट और एग्रीकल्चर के साथ संधी से मिलकर बना है।  खेती  की इस  विचारधारा में भी रसायनों का उपयोग बिल्कुल ही नहीं किया जाता है। यह एक प्रकार की प्रकृति पर आधारित खेती की एक आत्म निर्भर  तकनीक है  जिसमें बाहर से खाद  तथा  कीटनाशक  डाले बिना  जगल के पारिस्थितिक  तंत्र  पर आधारित इकोसिस्टम  की नकल करके इस प्रकार से खेती की जाती है जिससे पर्यावरण,जैवविविधता,प्राकृतिक
संसाधनों  तथा समाज को कोई नुकसान न हो।यह मानव की जरूरतें  जैसे भोजन ,पानी आवाश  आदि की पूर्ति करने  की  एक कृषि एवं जीवन शैली  प्रणाली है।पर्माकल्चर इस नोट अ रॉकेट साइंस बुत न  ईट इस  अ सब्जेक्ट ऑफ कॉमन सेंस।
Sustainable Agriculture, अथवा सतत कृषि का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचा बिना फसलों का उत्पादन करना है। वही पर्माकल्चर समग्र(हॉलिस्टिक) डिजाइन विज्ञान है जो केवल  खेती तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे मनुष्य और प्रकृति के बीच  सामाजज्स्य एक आत्म निर्भर जीवन शैली का निर्माण किया जाता है।
सस्टेनेबल एग्रीकल्चर अथवा टिकाऊ खेती का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का संवर्धन, और किसानों की आर्थिक लाभप्रदता के बीच  संतुलन बनाए रखना है। टिकाखेती अथवा सस्टेनेबलएग्क मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक लाभ और सामाजिक समानता पर टिकी है।
Petmaculture एंड आईपीएम दोनों ही टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियांहै । मुख्य अंतर यह है की पर्माकल्चर एक  संपूर्ण कृषि और जीवन शैली  डिजाइन प्रणाली है जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक आत्मनिर्भर इकोसिस्टम बनाती है। जबकि आईपीएम एक विशेष रणनीति है जिसका उपयोग विशिष्ट तौर पर नशीजीवों  के नियंत्रण अथवा प्रबंधन  करने  और उसके  नुकसान  को कम करने हेतु किया जाता है।
परमा कल्चर 
1, एक आत्मनिर्भर इकोसिस्टम बनाना जो स्वयं अपना पोषण करें जिसमें कोई कचरा या वेस्ट ना हो। 
2, दृष्टिकोण-यह कृषि से कहीं आगे बढ़कर आवास निर्माण, ऊर्जासरक्षण, जल प्रबंधन एवं संरक्षण, और समाज को आपस में जोड़ने पर ध्यान  केंद्रित करती है।
3,कार्य प्रणाली -इसमें कई फसलों को एक साथ मिलकरमश्रित खेती की जाती है जिससे प्राकृतिक विविधता बनी रहे और यह पेस्टिसाइड एवं अन्य  रसायनो का पूर्ण रूपेण  बहिष्कार करता है।
परमा कल्चर  का मुख्य उद्देश्य क्षतिग्रस्त हुए फसल पारिस्थितिक तंत्र का पुनर्स्थापना करते हुए इसकी सक्रियता को बरकरार रखना, कृषकों की आमदनी को बढ़ाना, कृषि उत्पादों के उपभोक्ताओ के बीच कृषि रसायनों के दुष्परिणाम की जानकारी एवं जागरूकता पैदा करना, है।
Three Ethics of Perma culture परमा कल्चर की तीन नैतिकताएं ;-
1Earth care पृथ्वी की देखभाल;-जमीन की उर्वरा शक्ति,को जीवांश कार्बन, सूक्ष्मजीवों  पशुओं के दरा उत्सर्जितमल अथवा वेस्ट पदार्थों, खेतों में पाए जाने वले खरपतवारों, फसलों के अवशेषों को खेतों मेंडलकर खेतोंमे जीवांश कार्बन के मात्रा डालते हैं । सूक्ष्मजीवों की संख्या को बढ़ाने के लिये जीवामृत,एवं घनजीवमृत,को खेतों डालना चाहिये।खेतों के कारण तरफ मेड बनाना चाहिए तथा मीडो पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वृक्षलगाने चाहिए। इस प्रकार देजमो की देखभाल का सकती है। 
2 People care,,:-मनुष्यों की दखभाल :-
 ग्रौसेफ़ फूड to eat ,and quality agricultural commodities to trade . Grow chemical
residue free Agricultural commodities  supported by test reports.
3,Fair share:- भावी पीढ़ियों के लिए उर्वरा शक्ति से भरपूर जमीन,खाने योग्य सुरक्षित रसायन अवशेषों मुक्त  भोजन,पीने लायक सuद्ध जल ,सांस लेने के लिए शुद्ध वायु, अच्छा क्लाइमेट एवं पर्यावरण, स्वस्थ एवं निरोगी समाज, सक्रिय एवं भरपूर जैव विविधता युक्त फसल पारिस्थितिक तंत्र,उत्तम गुणवत्ता वाले बीज, छोड़कर जाना आज की परम आवश्यकता है। इसके लिय किसानों तथा उपभोगताओं  में रसायनों के दुष्परिणामां के बारे में एक जागरूकता  फैलाई जाए। किसानो को चहीय की वे गुणवत्तायुक्त   कृषि उत्पादों का उत्पादन करें।
परमाकल्चर मैं एकल फसल उत्पादन प्रणाली के स्थान पर बहुफसलीय प्रणाली को बढ़ावा दिया जाता है।तथा रसायनों के दुष्परिणामों के बारे मैं जागरूक करते हुए ग्राहकों को सीधे  गुणवत्तायुक्त कृषि उत्पादों को बेचा जाए तथा किसानो की आय को बढ़ाने का प्रयास किया जाए तथा किसानो की कृषि उत्पादों की उत्पादन लागत कम करके खेती को किफायती बनाने का प्रयत्न किया जाए।इसके लिय रसायनिक इनपुट्स के स्थान पर रसायन  रहित  प्राकृतिक खेती के इनपुट्स को किसानों के घर पर ही बनाने का प्रयास किया जाए।जमीन के अंदर पॉयजन वाले  हेविमेटल्स के अवशेषों को  दूर करने के लिए पत्तेदार वेजिटेबल्स की कम से कम लगातार तीन फ़सलों का उत्पादन किया जाना चाहिए ।
खाने की चीजों को इंटरनेट से
 डाउनलोड नहीं किया जा सकता है अतः इनका उगना ही उत्तम होगा ।
क्षतिग्रस्त हुए पारिस्थितिक तंत्र का पुनर्स्थापना करें ।
प्राकृतिक खेती एव  परमा कल्चर के क्रियान्वयन हेतु एकोलॉजिकल इंजीनियरिंग campanion crops trap
Crops,Border crops,,Biopesticides,Biocontrol agents,इंटर क्रॉप्स, ,Seeds  का प्रयोग करे।
फसल उत्पादों के स्टोरेज,ट्रांसपोर्ट्सपोर्ट,एक्स्पोर्ट के दौरान उचित नियंत्रण एवं रसायन रहित विधियों   का इस्तेमाल करें।
पर्माकल्चर के क्रियान्वयन हेतु फैमिली डॉक्टर के स्थान पर फैमिली फर्मर
 के कांसेप्ट को लागू करें और किसानों से एक प्रकार का बातचीत का एग्रीमेंट के अनुसार जिसमें0 कृषि उत्पादों की गुणवत्ता किसानों को बरकरार रखते हुए बाजार भाव से ज्यादा भाव देकर चीज खरीदी जा सकती हैं और उपभोक्ताओं में इस बात की भी जागरूकता होनी चाहिए कि बिना सीजन वाली सब्जियां फलों फल आदि को ना खरीदें।
गांव में रोजगार के अवसर बढ़ने  पड़ें गे जिससेगांव से--नवयुवकों का पलायन शहरों के लिए रोका जा सके। कृषि उत्पादों का सर्टिफिकेशन ,प्रोसेसिंग तथा उनका विपदान न आदि को  भी बढ़ावा दिया जा सके। 

Tuesday, May 19, 2026

परमाकल्चर

 परमा कल्पचर
परमा कल्चर परमानेंट तथा एग्रीकल्चर का शॉर्ट  फॉर्म है।
पर्माकल्चर (Permaculture) का अर्थ स्थायी कृषि (Permanent Agriculture) और स्थायी संस्कृति (Permanent Culture) है। यह एक ऐसी प्राकृतिक और आत्मनिर्भर खेती की तकनीक है, जिसमें बाहर से खाद या कीटनाशक डाले बिना, जंगल के इकोसिस्टम की नकल करके खेती की जाती है। (
पर्माकल्चर (Permaculture) शब्द 'Permanent Agriculture' (स्थायी कृषि) और 'Permanent Culture' (स्थायी संस्कृति) का संक्षिप्त रूप है। यह प्राकृतिक इकोसिस्टम से प्रेरणा लेकर, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए मानव की जरूरतें (भोजन, पानी, आवास) पूरी करने की एक कृषि और जीवन-शैली प्रणाली है
पर्माकल्चर की मुख्य विशेषताएं:
  • उचित हिस्सेदारी" पर्माकल्चर का तीसरा मूलभूत सिद्धांत है (पृथ्वी की देखभाल और मानव देखभाल के साथ)। इसमें उपभोग पर सीमा निर्धारित करना, अधिशेष ऊर्जा और संसाधनों को प्रकृति में वापस लौटाना और सभी जीवित प्राणियों और भावी पीढ़ियों के लिए पृथ्वी की प्रचुरता तक समान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है।
    उचित हिस्सेदारी का सिद्धांत व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामुदायिक कार्रवाई के बीच सेतु का काम करता है। यह तीन मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है:
    • सीमाएं निर्धारित करना: जानबूझकर अत्यधिक उपभोग को सीमित करना और यह पहचानना कि प्राकृतिक संसाधनों (जैसे भूमि, जल और खनिज) की भी सीमाएं होती हैं।
    • अधिशेष का पुनर्वितरण: अतिरिक्त फसल, धन या समय का संचय करने के बजाय, आप अधिशेष को व्यापक प्रणाली में पुनः निवेश करते हैं।
    • अंतरपीढ़ीगत समानता: यह सुनिश्चित करना कि आपकी वर्तमान डिजाइन पद्धतियां भावी पीढ़ियों के लिए 
    , जीव-जंतु और कीट एक-दूसरे की मदद करते हैं।
  • कम लागत व कम मेहनत: इसमें ट्रैक्टर-जुताई, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता। यह पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
  • जल संरक्षण: बारिश के पानी को बहने देने के बजाय, छोटे तालाबों और खाइयों (Swales) के जरिए जमीन के अंदर सोखा जाता है।
  • मल्चिंग (Mulching): मिट्टी को कभी खाली या नंगा नहीं छोड़ा जाता। सूखी पत्तियों, लकड़ी के टुकड़ों byऔर कचरे से जमीन को ढका जाता है, जिससे नमी बनी रहती है और
पर्माकल्चर (Permaculture) शब्द 'Permanent Agriculture' (स्थायी कृषि) और 'Permanent Culture' (स्थायी संस्कृति) का संक्षिप्त रूप है। यह प्राकृतिक इकोसिस्टम से प्रेरणा लेकर, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए मानव की जरूरतें (भोजन, पानी, आवास) पूरी करने की एक कृषि और जीवन-शैली प्रणाली है
पर्माकल्चर की मुख्य विशेषताएं:
  • प्रकृति की नकल: खेत या बगीचे को एक प्राकृतिक जंगल की तरह विकसित किया जाता है, जहाँ पेड़-पौधे, जीव-जंतु और कीट एक-दूसरे की मदद करते हैं।
  • कम लागत व कम मेहनत: इसमें ट्रैक्टर-जुताई, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता। यह पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
  • जल संरक्षण: बारिश के पानी को बहने देने के बजाय, छोटे तालाबों और खाइयों (Swales) के जरिए जमीन के अंदर सोखा जाता है।
  • मल्चिंग (Mulching): मिट्टी को कभी खाली या नंगा नहीं छोड़ा जाता। सूखी पत्तियों, लकड़ी के टुकड़ों और कचरे से जमीन को ढका जाता है, जिससे नमी बनी रहती है और
  • पर्माकल्चर (Permaculture) शब्द 'Permanent Agriculture' (स्थायी कृषि) और 'Permanent Culture' (स्थायी संस्कृति) का संक्षिप्त रूप है। यह प्राकृतिक इकोसिस्टम से प्रेरणा लेकर, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए मानव की जरूरतें (भोजन, पानी, आवास) पूरी करने की एक कृषि और जीवन-शैली प्रणाली है
    पर्माकल्चर की मुख्य विशेषताएं:
    • प्रकृति की नकल: खेत या बगीचे को एक प्राकृतिक जंगल की तरह विकसित किया जाता है, जहाँ पेड़-पौधे, जीव-जंतु और कीट एक-दूसरे की मदद करते हैं।
    • कम लागत व कम मेहनत: इसमें ट्रैक्टर-जुताई, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता। यह पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
    • जल संरक्षण: बारिश के पानी को बहने देने के बजाय, छोटे तालाबों और खाइयों (Swales) के जरिए जमीन के अंदर सोखा जाता है।
    • मल्चिंग (Mulching): मिट्टी को कभी खाली या नंगा नहीं छोड़ा जाता। सूखी पत्तियों, लकड़ी के टुकड़ों और कचरे से जमीन को ढका जाता जिससे जिससे नमी बनी रहती है ।
    • Thee Ethics of Perma culture.
    • 1,Earth care:-  To enhance the fertility of soil,through enhancing the quantity of Jeevansh carbon, microorganisms ,Earthworms , and Humus in the soil.
    • 2, People Care:- Grow safe food to eat and quality agricultural commodities to trade.Thre should not be residue of chemicals pesticides above MRL.which must be supported by test reports.of FSSAI off India. Adopt IPM or Natural Farmingto Grow safe Food to eat.
    • 3,Fair Share:
    उचित हिस्सेदारी" पर्माकल्चर का तीसरा मूलभूत सिद्धांत है (पृथ्वी की देखभाल और मानव देखभाल के साथ)। इसमें उपभोग पर सीमा निर्धारित करना, अधिशेष ऊर्जा और संसाधनों को प्रकृति में वापस लौटाना और सभी जीवित प्राणियों और भावी पीढ़ियों के लिए पृथ्वी की प्रचुरता तक समान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है। 

    Permaculture Principles
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    उचित हिस्सेदारी का सिद्धांत व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामुदायिक कार्रवाई के बीच सेतु का काम करता है। यह तीन मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है: 
    सीमाएं निर्धारित करना: जानबूझकर अत्यधिक उपभोग को सीमित करना और यह पहचानना कि प्राकृतिक संसाधनों (जैसे भूमि, जल और खनिज) की भी सीमाएं होती हैं।
    अधिशेष का पुनर्वितरण: अतिरिक्त फसल, धन या समय का संचय करने के बजाय, आप अधिशेष को व्यापक प्रणाली में पुनः निवेश करते हैं।
    अंतरपीढ़ीगत समानता: यह सुनिश्चित करना कि आपकी वर्तमान डिजाइन पद्धतियां भावी पीढ़ियों के लिए 
    • उचित हिस्सेदारी" पर्माकल्चर का तीसरा मूलभूत सिद्धांत है (पृथ्वी की देखभाल और मानव देखभाल के साथ)। इसमें उपभोग पर सीमा निर्धारित करना, अधिशेष ऊर्जा और संसाधनों को प्रकृति में वापस लौटाना और सभी जीवित प्राणियों और भावी पीढ़ियों के लिए पृथ्वी की प्रचुरता तक समान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है।
      उचित हिस्सेदारी का सिद्धांत व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामुदायिक कार्रवाई के बीच सेतु का काम करता है। यह तीन मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है:
      • सीमाएं निर्धारित करना: जानबूझकर अत्यधिक उपभोग को सीमित करना और यह पहचानना कि प्राकृतिक संसाधनों (जैसे भूमि, जल और खनिज) की भी सीमाएं होती हैं।
      • अधिशेष का पुनर्वितरण: अतिरिक्त फसल, धन या समय का संचय करने के बजाय, आप अधिशेष को व्यापक प्रणाली में पुनः निवेश करते हैं।
      • अंतरपीढ़ीगत समानता: यह सुनिश्चित करना कि आपकी वर्तमान डिजाइन पद्धतियां भावी पीढ़ियों के लिए 







Tuesday, May 5, 2026

प्राकृतिक खेती एवं स्वास्थ्य

प्राकृतिक खेती के कुछ सिद्धांत
1, मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाना। 
2,जैव विविधता , पर्यावरण,जीवन के पांच महाभूतों  का संरक्षण
3,मानव एवं मिट्टी के शवास्थ्य  की ड़ेखभाल करते हुए खेती करना।
4 भविष्य की पीढ़ियों को ,शुद्ध खाना, शुद्ध हवा ,तथा शुद्ध पर्यावरण प्रदान करना।
5, हम प्रकृति के विरोध मैं  जा रहे है।
6, रासायनिक खेती से उत्पादन्त बढ़ा परन्तु किस्नानों की आमदनी नहीं बड़ी।स्वास्थ्य,पर्यावरण  जैव विविधतासित प्राकृति की व्यवस्था पर  विपरीतप्रभाव पड़ा।
7 आर्थिक असंतुलन बढ़ा। बाजार पनपे हैं।
8,प्राकृति के साथ जुड़े  रहें।
9,बीजों की परंपरा का ध्यान रखें।।
10,फैमिली फार्मर्स कंसेप्ट 
11, कृषकों एवं उपभोक्ता परिवार  के बीच संबंध।
12,पूरकता एवं उपयोगिता का सिद्धांत ।
13, इनपुट आधारित खेती नहीं करना है बल्कि समझ पर आधारित खेती करना है।
14,हमें मिट्टी को अवश्य छूनाचहिय। धरती अपनी खाद स्वयं बनती है।
15,गमला मै प्लांट लगाना भी एक प्रकृति खेती है।
16पूरकता,विविधता, उत्पादन का घनत्व ,Coexitence ,इकोलॉजिकल बैलेंस का सिध्दांत
17,भोजन मैं हवा  पानी एवं  ठोस 
18 सहअस्तित्व  का सिद्धांत।
19,आर्थिकसंकट।
20,
प्राकृतिक खेती देसी गाय, देसी बीजदेसी , देसी केचुआ एवं देसी पद्धतियों ,देसी गाय के मल मूत्र एवं गोबर पर आधारित इनपुट तथा देसी परंपराओं पर आधारित खेती करने का तरीका है जिसमें प्रकृति में चल रही स्वचालित,self organised, स्वयं सक्रिय self active,स्वयं पोशीself nourished, स्वयं विकासीय ,self developing,स्वयं नियोजित ,self planned,सहजीवी symbioticएवं आत्मनिर्भर self sustained ,,फसल उत्पादन रक्षा तथा फसल प्रबंधन व्यवस्था पर आधारित तरीकों को अध्ययन करके तथा   उनसे संबंधित सभी विधियों  फसल उत्पादन हेतु प्रयोग करके या अपना कर खेती की जाती है। इसमें रसायनिक विधियों को छोड़कर आईपीएम में प्रयोग की जाने वाली सभी विधियों को शामिल किया जा सकता है या किया जाता है।
21,


Thursday, April 23, 2026

IPM in terms of the farmers. किसानों के विचार से आईपीएम क्या है?

विभिन्न प्रकार की संस्थाओं, वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवीयो, तथा प्रगतिशील किसानों,ने  आई पी,एम   की विभिन्न पकार की परिभाषाएं दी हैं ।यहां तक मैंने भी आई पी एम की 20-25 परिभाषाएं दी है। परंतु जैसा कि मैंने पहले बताया की आईपीएम जीवन के प्रत्येक मुद्दे से संबंधित खेती करने की तथा वनस्पति संरक्षण करने की एक विचारधारा  है। आई पी एम  नासिजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति कै समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है । आई पी एम जहां  एक तरफ किसानों की जीविका  संचालन से  जुड़ी हुई है वहीं यह अन्य सभी लोगों तथा पशुओं  ,सूक्ष्म जीवों, पक्षियों  आदि की खाद्यसुरक्षा को भी सुनिश्चित करने  में अपना महत्व पूर्ण योगदान देती है। खाने के योग्य सुरक्षित कृषि उत्पादों का कम से कम  खर्चे में अधिक से अधिक उत्पादन,और उनका बाजार से अधिक से अधिक विक्रय मूल्य प्राप्त करना किसानों का खेती करने का मुख्य उद्देश्य होता है। इसके लिए किसान भाई विभिन्न प्रकार की विधियों। प्रयोग करते हैं जिसमें रासायनिक विधियां भी शामिल होती हैं।परंतु खाने के योग्य सुरक्षित भोजन के उत्पादन के लिए 
रासायनिक विधियों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप मैं  किसी आपातकालीन परिस्थिति के निदानहेतु ही किया जाता है।।कृषि उत्पादों का उत्पादन भूमि की उर्वरा शक्ति एवं जमीन मै  पाय जानेवाले जीवांश कार्बन , सूक्ष्मजीवों जीवों,एवं उनसे निर्मित   ह्यूमस से होती है अथवा निर्भर करती है। अतः जीवांश कार्बन   की अधिकता बनाए रखने के लिए जमीन मैं कार्बनिक पदार्थ जैसे जानवरों का मल मूत्र , पौधों तथा फसलों के अवशेषों को तथा जमीन मैं सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को बढ़ाने के लिए जीवामृत  तथा घन जीवामृत  को जमीन मैं फसलों की बुवाई से पूर्व पलेवा के समय खेतों में डालते हैं। खेतों के चारों तरफ मेड बनाते हैं तथा मेड पर विभिन्न प्रकार के पेड़ भी लगते हैं जाे चिडियों के बैठकों का  काम करते हैं तथा विभिन्न प्रकार के नशीजीवों का प्रबंधन करते हैं। मेडेन एक खेत  का जीवांश कार्बन , मिट्टी और पानी दूसरे खेत मैं रोकने के लिए सहायक होती हैं। खरपतवारों की  ऊंचाई अगर फसल से ऊपर होजनेवपर उनको वहीं खेत में ही दबा देना चाहिय।
आजकल का आईपीएम / खेती बाजार  तथा रसायनों पर आधारित है यद्यपि यह आईपीएम केसद्धांतों के विपरीत है। खेती के सारे इनपुट बाजारों से खरीदे जाते हैं जिससे उत्पादन की कीमत  बढ़ जाती है । कृषि उत्पादन की कीमत
को कम करना खेती का प्रमुख कार्य  है । इसके लिए खेती के इनपुट्स को बाजारों से ना खरीदा जए बअली किसानों के घर  पर ही बनाएंगे। जिससे किसानों की कृषि उत्पादों की लागत कम होगी तथा किसानों आमदनी बढ़ेगी। कृषि उत्पादों के उत्पादन के अलावा उनकी पैकेजिंग ,वैल्यूएडशन, प्रमाणीकरण,तथा विपणन संबंधी गति विधियों को भी आई पी एम मैं शामिल करना चाहिए़।
IPM is the Sangam / merger  or Triveni   of three rivers or schemes of Dte. Of Plant Protection, Quarantine and Storage commenced from 1991-92., These are Biological control,or Ganga ,Pest Surveillance ,or Yamuna and  Plant Protection or Sataswati in which now Plant Protection / Sarswati is  invisible. This  Triveni  is  .spreading or dissiminating   the messege of IPM  among its all stakeholders  to grow / protect the plants / Crops  and Agricultural commodities / crops  with minimum expenditure, minimum use of  chemicals or  without use of chemicals and with least disurbance to life,nature  Environment and society through adoption of all available, affordable and feasible methods of pest management in compatible manners  to suppress the pest population below ETL..
I will remain obliged of IPM Scheme for providing bread and butter to  me as wellas to my children  throughout my life. Now according to my own idea IPM has now become the thought of the integration of   all the schemes of Dte Of P,PQ and S with a concept  or theme of ensuring food Security along with food safety, environment and ecological safety.

Monday, April 20, 2026

प्लांट प्रोटेक्शन (पादप संरक्षणकृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत फसलों को कीटों, बीमारियों, खरपतवारों और हानिकारक जीवों से बचाकर उनकी उत्पादकता और गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जाता है। इसका उद्देश्य फसलों को नुकसान से बचाना और पैदावार बढ़ाना है, जिसके लिए यांत्रिक, रासायनिक, जैविक और कृषि पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
प्लांट प्रोटेक्शन के मुख्य पहलू:

Sunday, April 19, 2026

प्राकृतिक खेती- डॉ वी ,के सचान

आज की खेती अथवा  रासायनिक खेती  में निवेश बहुत लगता है। किसान पहले महंगे से महंगे बीज खरीदते हैं जिसमें बहु अधिक पैसा लगता है। जबकि बीज पहले  अपने घरों में ही किसान बनाते थे । इसके अतिरिक्त विभिन्नपकार के रसायनों जैसे उर्वरक, कीटनाशक, फफूंदी नाशक, खरपतवार नाशक, विभिन्न प्रकार के ग्रोथ प्रमोटर्स, को उच्च दामों पर बाजार से खरीदे जाते हैं जिससे किसानों का अधिकांश पैसा लागत के रूप मे लग जाता है । इसी प्रकार से ट्रैक्टरों के द्वारा जुटाई, ट्यूबवेल से पानी तथा बिजली का बिल, विभिन्न परकार की कल्चरल क्रियाओं को जब मजदूरों के द्वारा कराया जाता है तो उसमें बहुत सारा खर्च होता है। अर्थात जो पैसा हमें अपने घर पर होना चाहिए़ वो  बाजार मैं देना पड़ता है। इस प्रकार से किसानों की कुल आय में काफी कमी आ जाती हैं।
धरती की उर्वरता शक्ति ,धरती में जीवाश्म कार्बन तथा ह्यूमंस की मात्रा कम  हो  जाने से  धरती  की उर्वरा शक्ति बहुत ही कम हो गई है । अतः हमें धरती मैं  हमास की 

 मात्रा तथा सूक्ष्म जीवाणु कि संख्या बढ़ाना पड़ेगा जिससे जमीन  की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हो सके। जमीन की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करना आज की परम आवश्यकता है ।
जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाने के लिए पशुओं के मल मूत्र तथा   फसलों के अवशेष तथा हरी खाद्य  का प्रयोग करना चाहिए़।तथा सूक्ष्म जीवाणुओ की संख्या में बढ़ाने के लिए जीवामृत, धनजीव अमृत आदि को प्रयोग  के  साथ जब खेत मैं  पर्याप्त नमी हो फसल बो ने से पहले पलेवा के साथ प्रयोग   करना चाहिए़।
जमीन मै से जीवांश कार्बन को दूसरे खेत मैं  जाने रोकने के लिय खेतों के चारों तरफ मेड बनाना चाहिए    तथा मीडो पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वृक्ष लगाने चाहिए जिनको पक्षी बैठकों के रूप में प्रयोग कर सकें।
प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार या उसमें कुछ सुधार करके जब खेती की जाती है तब उसे प्राकृतिक खेती कहते हैं। प्राकृतिक खेती एक विचार है। यह एक जीवन शैली है ।
जब हमारा विचार प्रकृतिमय  हो जाएगा। तभी हम प्राकृतिक खेती कर सकते हैं ।
जब हमें प्रकृति, और उसके संसाधनों तथा जैव विविधता, पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदना,सम्मान,एवं दर्द महसूस होगा और अंदर से यह भी महसूस होगा कि कहीं  रसयनो के दुसप्रभावों  के शिकार कहीं हम या हमारे परिवारजन न हो जाएं  तब ही हमारे मन मैं प्राकृतिक खेती के प्रति रुझान पैदा होगा और हम प्राकृतिक खेती कने के लिय आगे बढ़ सकें ge। 
प्राकृतिक खेती का उद्देश्य सर्वे भवंतु सuखना  , सर्वेश संतु निरामया अर्थात इस ब्रह्मांड मेंपाए जानेवाले  सभी जीव   सुखी तथा निरोगी हो। प्रकृति को बर्बाद ना करें। हम इस प्रकार से खेती करें कि जमीन की उर्वर शक्ति,जैव विविधता,जल,जंगल, जानवर,जलवायु, और जन  पर कोई  विपरीत प्रभाव ना पड़े इसी को हम प्राकृतिक खेती कहते हैं। जमीन मैं जैविक   कार्बन की मात्रा को इस समय 0,3  है वह 1,0 तक पहुंच जाय । जमीन मैं तो जीवांश कार्बन को  बढ़ाना ही पड़ेगा। पानी है जिंदगानी इसके बगैर बेकार है जिंदगी की कहानी ।पानी को तो बचाना ही पड़ेगा। गाय आधारित खेती की जगह हमें  बैंल पर आधारित खेती करनी ही पड़ेगी और इनका गोबर खेत में डालने पड़ेगा तभी प्राकृतिक खेती हो सकेगी। How to save soil fertility is the main Mantra of prakritik kheti. यह धन कमाने का वक्त नहीं है यह जान बचाने का समय है।

Friday, April 17, 2026

Acharya दev brat - His thoughts about prakritik kheti.

Difference between ween Organic  kheti and Prakritic kheti.
1, जैविक   खेती में ना खर्चा कम होता है ,न उत्पादन बढ़ता है और ना ही परिश्रम कम   होता  है । इस खेती मैं भी इनपुट्स  बाज़ार ही खरीदे जाते हैं जो रासायनिक इनपुट से भी  महंगे होते  हैं ।
2, ऑर्गेनिक खेती के प्रमुख तीन प्रकार के इनपुट्स होते हैं ।
ये हैं ,1, कंपोस्द खाद ''2, वर्मीकपोस्ट खाद ,,3,, बायो डायनॉमिक्स अर्थात जानवरों के सींगों की खाद ।
इन तीनों प्रकार के इनपुट एस का प्रयोग करना साधारण तौर पर किसानों के लिए असंभव है तथा महंगा है।
3, केंचुआ के खाद मैं विभिन्न प्रकार के हैवीमेटल पाए जाते हैं  जो हमारे शरीर में जा करके तरह-तरह की बीमारियां पैदा  करते हैं। गोबर की  खाद वातावरण का टेंपरेचर जब 40 डिग्री से ऊपर होता है तो कार्बन तथा ऑक्सीजन से रिएक्ट करके कार्बन मोनोऑक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसे उत्पन्न करते हैं जो ग्रीनहाउस गैसेस है जींस वातावरण का टेंपरेचर बढ़ता है इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। 
प्राकृतिक खेती 
1, यह खेती प्रकृति तथा जंगल के सिद्धांतऑन  पर आधारित है। प्रकृति जब जंगल के सभी पेड़ पौधों की भरपूर पूर्ति करती है तो हमारे खेतों  की फसलों   की भी पूर्ति करेगी।
2 प्राकृतिक खेत भूमि मेंपाए जाने  वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों पर आधारित खेती है। जो पतझड़ होने के  बाद  नमी की उपस्थिति में पौधों के  पत्तों को सदा कर ऑर्गेनिक कार्बन में बदलते हैं जो बाद  में   ह्यूमस मैं बदल जाता है।ह्यूमस ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से सूक्ष्म जीव खत्मह चुके हैं । अत इनकीसख्या को जमीन मैं बढ़ाना  अति आवश्यक है। इसके लिए जमीन में कार्बनिक पदार्थ जैसे जानवरों का मल मूत्र पौधों व फसलों के अवशेष तथा जीवामृत का प्रयोग उसे वक्त करनाचहिए जमीन मैं पर्याप्त  मात्रा में नमी हो।
3, हमें रासायनिक खेती के साथ-साथ पारंपरिक खेती की विधियों को नहीं छोड़ना चाहिए था ।
4, सरकार ने 2481 करोड़ रुपए से राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की स्थापना  की है जिसमें  किसानों को गायोंक खरीदने तथा महिला एवं पुरुष किसने को प्रशिक्षित करने तथा गायों की नसों को सधारने  पर  जोर दियाजाएगा।

Tuesday, April 14, 2026

From Mouth of Dr,Sultan Ismail Earth worm man or father of Earthworm.

1,Soil is a living medium  for growing of plants /crops.
2,Air passes through  soil .It meanse it respires.
3,living minus nonliving like air / water =nonliving .soil intake air and release carbon di oxcide. It also intake water and release water vapour .
4,Soil has got circulatory system as fertilizers and water cirulate bet been soil particles.
5,Soil has
an Excretory system also as salts are  thown  outside orsurface .
6,Soil has its reproducftive  System also as tissue cultures  are plnted in soil to produce crops .First they are grown in test tube in a media.
7,Soil has got  brain also.It knowes what has to be rotten and what has to be  grown.
8,Eroma  It's eeroma is  due to  fungus A
Actinomycin. 
9 Presently  Indian soil is in ICU.with organic Carbon 0.3 .
10. Earthworm is the pulse  of  soil. टेक्नोलॉजी ने केंचुए मार दिया। केंचुए के बारे में डार्विनन पहले एक किताब लिखी थी  उसमें उन्होंने लिखा था की केंचुआ जमीन की नाड़ी है वह जमीन की इंटेस्टाइन  है । केंचुआ कई प्रकारके होतेहैं कुछ केंचुए जमीन के सरफेस पर होते हैं कुछ बीच मैं और कुछ निचली सतह पर होते हैं।
सॉइल इकोसिस्टमम मैं माइक्रो आर्थ्रोपोड्स, माइक्रोऑर्गेनाइज्म , कार्बन आदि होते हैं। जो मिलकर एक खिचड़ी बनाते हैं और यह खिचड़ी केंचुआ खाते हैं। केंचुआ अपने शरीर से एक प्रकार का म्यूकस पदार्थ निकलता है जो केंचुए के द्वारा बनाई गई सुरंग के ऊपरी सतह पर जाताहै। ह सब हवा खाते  हैं।
11,Technologies are not negatives  but their implementation is wrong . Which give rise  wrong results . अधिक से अधिक दाने पैदा करने के लिए हाइब्रिड बनाए गए थे। इन अधिक से अधिक दाने वाले हाइब्रिड के ऊपर अधिक से अधिक कीटों का प्रकोप हुआ और उसके रोकथाम के लिए रासायनिक पेस्टिसाइड्स का उपयोग किया गया जिससे उनका नियंत्रण करने वाले नेचुरल इमेज या प्राकृतिक शत्रु खत्म हो गए तथा हानिकारक कीटों की संख्या में वृद्धि हो गई इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के रसायन हमारे विभिन्न खाद्यपदार्थ म
प्रवेश कर गए जो खाद्य श्रृंखला के. DUaraदरा हमारे शरीर में प्रवेश किए जिससे हमें विभिन्न प्रकार की बीमारी योका प्रकोप होगया । रसायनोंके अंधाधुंध प्रयोग स जमीन के अंदरप विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो गए 
 ।

Sunday, April 12, 2026

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में बदलावTra sition from chemical farming to Natural farming.

1.Fear based Agticulture. भययुक्त खेती। 
  यह तकनीक अथवा टेक्नोलॉजी काम करेगी या नहीं इस प्रकार का भय कृषकों के बीच रहता है।
2, जीवन के पचो   महाभूत अर्थात क्षति,( जमीन),पानी, पावक अर्थात अग्नि,गगन समीरा अर्थात हवा सारे संक्रमित और और प्रदूषित हो चुके हैं। हमारी जनरेशन ने ही इनको कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करके विषाक्त बना दिया  है । सबसे पहले इन सभी तत्वों को प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है।उदाहरण  के तौर पर पानी तथा मिट्टी की जांच करवाना चाहिए और उसके अनुसार पानी का पीएच तथा उसमें घुले हुए अन्य हानिकारक पदार्थ की जानकारी लेनी चाहिए इसी प्रकार मिट्टीक पीएच, उसमें जीवाश्म कार्बन की मात्रा तथा सक्ष्म
 जीवों एवं सूक्ष्म तत्वों की जानकारी लेनीचहिए । इसके साथ-साथमट्टी में मौजूद रासायनिक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी भी लेनी चाहिए और उसकी के हिसाब से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन तथा ह्यूमस की मात्रा को बढ़ाना चाहिए । इसके लिए जीवामृत तथा घन जीवामृत को सिंचाई के साथ फसल की बुवाई से  पहले पलावा के सथ डालना चाहिए। इसके लिए हरी खाद का प्रयोग भी करना चाहिए। रासायनिक करो का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं करना चाहिए। क्योंकि रासायनिक खादों में  कार्सिनोजेनिक पदार्थ भी पाए जाते है जिनसे बचना बहुत जरूरी है । यूरिया  अथवा नाइट्रोजन का मोबिलाइजेशन हवा केथ होना चाहिए । मानव, जानवर, जंगल ,के लिए प्रतिशत के हिसाबसे खेती में जमीन का प्रयोग करना चाहिए।
3 , खेती को ब्रदरहुड अथवा भाईचारे की हैसियतस करनी चाहिए़ और इस बात का ध्यान रखना चाहिए की अगर हम रसायन युक्त खेती करेंगे तो वह रासायनिक पदार्थ हमारे ही खाएंगे तथा उनके दुष्प्रभाव से प्रभावित होंगे और बीमार होकर अस्पताल में जाएंगे। 
4, हमें अपनी स्थानीय मिट्टीसे उगाया हुआ खाना ही खाना चाहिए़।
5 बेमौसमी सब्जी तथा फल के प्रयोग के परहेज करना चाहिए। क्योंकि भी मौसमी सब्जियों में पेस्टिसाइड अधिक मात्रा में डाले जाते हैं। हाइड्रोपोनिक पौधों से प्राप्त फल तथा सब्जियां स्वास्थ्यके लिए लाभकारी नहीं होते हैं।
6, खाद्य पदार्थों को कई बार रासायनिक इंसेंटिसाइड से स्प्रे करके बेचा जाता है और वही सब्जी हम लोग कहते हैं जिससे हमारे शरीर में विभिन् प्रकार की बीमारियां  पैदा  होती है। इसके लिए किसने समाज के बीच जागरूकता पैदाकरनी पड़ेगी।
7क्लीन कल्टीवेशन गलत है। फसल अवशेषों को खेतों में
ही डालना चाहिए।
8, पानी का वाष्पन रोकने के लिय हमें मल्चिंग करनाचहिए । इसके लिए काऊ डंग आर्ककाऊ यूरिन आदि कई प्रयोग कर सकते हैं। 
9 इंटरक्रॉपिंग तथा क्रॉप रोटेशन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। तथा जूता ए बंद कर देना चाहिए।
10 एनिमल फीड भी हमारे फीड से ही आता है। पौधों तथा मिट्टी मैं दी(deadiction) करना चाहिए।
11,आईपीएम के क्रियान्वयन हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा दिया जाता है। जैविक इनपुट्स में विभिन्न प्रकार के मित्र कीट जिसमें पर भक्षी
क किट, परजीवी किट ,विभिन्न प्रकार की मकड़या , एंटोमोफागस इंसेक्ट्स, एनपीवी वायरस, विभिन्न प्रकार के खरपतवारों के लिए पाए जाने  फाइटोफागस इंसेक्ट्स, DD 136 nematodes,, विभिन्न प्रकार की एंटागनिस्टिकफंगी, आदि शामिल है । इनकी अनु उपलब्धता आईपीएम के क्रियान्वयन की प्रमुख बाधा है। इसीलिए किसान उपयुक्त मात्रा में खेती में नासिजीव नियंत्रण हेतु जैविक इनपुट्स को बढ़ावा नहीं दे पाते हैं क्योंकि इनके लिए कोई भी प्राइवेट उद्यमी इनके उत्पादन हेतु औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए इच्छुक नहीं  होते हैं जिसकी एक वजह जैविक नियंत्रण कारकों अथवा जैविक इनपुट्स की शेल्फ लाइफ अथवा स्वयं का जीवन बहुत कम होता है तथा इनका स्टोरेज अधिक समय तक नहीं किया जा सकता है। इन्हीं सब कारणों की वजह से किसान जैविक इनपुट की क्रियाशीलता पर अधिक विश्वास नहीं कर पाता तथा इनका प्रयोग भी नहीं करता है। यद्यपि सभी डेमोंसट्रेशंस में जैव नियंत्रण कारक की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है। जैव नियंत्रण कारक कुछ विशेष नशीजेवोंके नियंत्रण में बहुत ही उपयोगी अथवा मददगार सिद्ध हो चुके हैं और कुछ नशीजीवों  के नियंत्रण के लिए कुछ अन्य रसायन रहित विधियों के साथ उपयोगी साबित हुए हैं। अतः आईपीएम  के क्रियान्वयन हेतु कृषकों को जैविक नियंत्रण कारकों को अन्य रसायन रहित विधियों के साथ प्रयोग करना चाहिए। जैविक नियंत्रण कारकों को प्राकृतिक खेती के इनपुट के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
12,

Thursday, April 9, 2026

डॉ सुभाष चंद्र इंटरव्यू से।

खेती किसानी की दुनिया बाहर से जितनी बोरिंग लगती हैअंदर से उतनी  ही द‍िलचस्प है.  इसमें राजनीत‍ि, अर्थशास्त्र और व‍िज्ञान का जबरदस्त कॉकटेल है. कृष‍ि और क‍िसानों को बचाने के ल‍िए कुछ ऐसे काम भी होते हैं ज‍िसकी आम आदमी कल्पना भी नहीं करता. सरकार अनाज और फल-सब्ज‍ियों का उत्पादन बढ़ाने के ल‍िए बड़े पैमाने पर उर्वरकों का आयात करती है. लेक‍िन, आपने ऐसी कल्पना कभी नहीं की होगी क‍ि कीटों का भी आयात होता है. आप सोचेंगे कीटों का आयात क्यों? कीट तो खतरनाक होते हैं? असल में सभी कीट खेती के ल‍िए खतरनाक नहीं होते. अगर कोई कीट भारतीय कृष‍ि के ल‍िए खतरा बनने लगता है तो सरकार उसे कंट्रोल करने के ल‍िए उनके मूल देश या क्षेत्र से उनके प्राकृतिक शत्रु कीटों को इंपोर्ट करती है. दुश्मन को उसके सामने लाकर खड़ा कर देती है. नेचर का बनाया यह एक ऐसा खेल है क‍ि खेती के ल‍िए खतरनाक कीटों के प्राकृत‍िक शत्रु कीट उन्हें साफ कर देते हैं या पौधों के रास्ते से हटा देते हैं. 

बहरहाल, साल दर साल कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है लेक‍िन न तो फंगस कम हुए, न कीट लगने कम हुए और न खरपतवारों की संख्या में कोई कमी आई।

Thursday, April 2, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट(आई पी एम)

          इंटीग्रेटेड पेस्ट मनेजमेंट (आई पी एम)
आईपीएम, नासि जीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति के समेकित प्रबंधन की एक विचारधारा है जिसमें नाशीजीव प्रबंधन एवं संपूर्ण कृषि तत्र के  सुचारूरऊप से क्रियान्वयन करनेकी सभी विधियों को समेकित रूप से प्रयोग करके फसल पारिस्थितिक तंत्र मैं पाए जाने वाले सभी नशीजीवों  की संख्या को आर्थिक हानी स्टार के नीचे सीमित रखते हुए खाने योग्य सुरक्षित तथा व्यापार हेतु गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पादों का इस प्रकार सेउत्पादन किया जाता है कि कृषि उत्पादों का अधिकतम से अधिक तम विक्रय मूल्य प्राप्त हो सके तथा साथ साथ जमीन की उर्वरा शक्ति, सामुदायिक स्वास्थ्य, फसल पारिस्थितिक तंत्र,पर्यावरण, जैव विविधता , जीवन एवं जीवन के पंचमहाभूत क्षिति , जल पावक,गगन, समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों एवं  कृषकों  की आमदनी पर विपरीत प्रभाव ना पड़े तथा प्रकृति एवं समाज के बीच सामंजस्य स्थापित  हो सके। आईपीएम के क्रियान्वयन में रसायनों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किसी भी आपातकालीन स्थिति के निदान हेतुCIB &RC के द्वारा प्रदान  की गई संस्तुति के अनुसार किया जाता है।
         प्राकृतिक खेती आईपीएम का ही एक सुधरा हुआ रूप है जिसमें रसायनों का प्रयोग बिल्कुल ही नहीं  कियाजाता है तथा जमीन की उर्वरा शक्ति, जैव विविधता, जीवन के पंच महाभूत क्षिति,जल, पावक गगन समीरा तथा प्रकृति और उसके संसाधनों, वर्षा जल के संरक्षण,को भी महत्व दिया  जाता है ।
      आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती का मुख्य उद्देश्य खाने के योग्य सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, एवं इकोलॉजिकल सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए जीडीपी पर आधारित विकास के साथ-साथ इकोलॉजिकल , इकोनॉमिकल, प्राकृतिक एवं सामाजिक विकास को महत्व दिया जाता है।
         खेती कोई भी हो वह प्रकृति और उसकी व्यवस्था के द्वारा संचालित होती है अथवा क्रियान्वित की जाती  है प्रकृति  को ही भगवान  कहा जाता हैं जिसका मतलब  होता है भू अर्थात जमीन, गगन अर्थात आकाश ,वायु  , अग्नि,नीर अर्थात पानी । जीवन के इन्हीं पंचमहाभूतों का सरक्षण करनेसे खेती के लिय बहुत जरूरी है ।

Wednesday, April 1, 2026

Production in Agriculture (From Green Revolution to Ever Green Revolution ,from food security to food and ecological safety,and from food quantity to food quality and Nutritional food.)

1,Production by masses not mass production. By Dr M S Swaminathan.
2, Production cost plus 50 %. MSP. Farmula by Dr MS Swaminathan
3,Sale price of Agri produce must  be fixed by the farmers not by the   Govt.
4, Agriculture is not respectable job.
,From cip to mouth.to right to food  stage.
5,We do not bargin in  in malls but we bargin with  the  farmers .
6, Enormous use of fertilizers to illogical use of water.
7 From Green Revolution to ever Green    Rrvolution.Sustainable Agriculture .
Wheat and Rice have become Commercial crops  due to Green Revolution. 
8, Refarming the policies  related with  Agriculture.
9,Nutrition intensive Agriculture.
10,Bengal Famine from 1942 to 19 46.Nearly 40 lakh people died  due to starvation.
10,We became  exporter of wheat and rice from importer quickly hence achieved Green Revolution. Our need was calory which got from wheat and Rice 
11, Are  we  producing nutritional  food? No.
    Nutritional value of our food was reduced.Nutrition is separated from Agriculture.We enhanced the production of food grains  but not the nutritive value.
12,We should maintain soil wth organic carbon and nutrition.We need to go towards Nutrition dense Agriculture for which we need to make farmers centric policies.
13,After ten years the quality of food will remain  suitable to eat or not.
14.Our stomach is filled that is why we are talking .
15 Green Revolution has played both positive as well as negative roles.It has enhance the tendency of illlihitimate use of inputs.storing of things eventhey are not needed.Green Revolution has enhanced the inhuman tendency or nature of man.Monopolization of technology is bad.
16 Wellfare of all must be our moto.



.

8,

Saturday, March 28, 2026

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (आई पी एम) विचारधारा में बदलाव

प्रारंभिक तौर पर इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट अर्थात आईपीएम की  शुरुआत आईपीएम फॉर बेटर एनवायरनमेंट अर्थात उत्तम पर्यावरण हेतु आईपीएम अपनाये के नारे के साथ हुई थी ( 1991 ,-1992,,)तथा आईपीएम की की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 22 राज्यों में 26 केंद्रीय एकीकृत नासिक जीव प्रबंधन केंद्र स्थापित किए गए जिनकी संख्या बादमें 35 हो गई और अब यह संख्या 11 लोकस्ट वार्निंग आर्गेनाइजेशन के केंटो को मिलाकर तथा दो नए के दो कई मिलकर 48 हो गई है । आईपीएम में आईपीएम में सामुदायिक स्वास्थ्य, इकोसिस्टम, पर्यावरण, जैव,विधता, जीवन और उसके पंच महाभूत क्षिति, जल , पावक, गगन, समीरा तथा प्रकृति और उसके ससाधनों, समाज और उससे जुड़े हुए विभिन्न मद्दों, तथा खेती के क्रियान्वयन हेतु प्रयोग किए जानेवाले विभिन्न प्रकार की विचारधाराओं एवं रसायन रहित खाने योग्य सुरक्षित कृषि उत्पादों के उत्पादन की सपूर्ण पद्धति, उनका वैल्यूएडशन, गुणवत्ता नियंत्रण, सर्टिफिकेशन, लाइसेंसिंग,पैकेजिंग, विपणन एवं व्यापार, कॉस्ट बेनिफिट 
Ratio, खाद्य, पोषण,स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी हुई विभिन्न सुरक्षाओं, समस्याओं एवं मुद्दों को भी शमिल किया गया। इसके अतिरिक्त कृषकों की आमदनी, आदिसे जुड़े हुए मुद्दों को भी शामिल कर लिया गया। कृषि अथवा खेती का मुख्यउद्देश्य  सर्वे भवंतु सुखना सर्वेसतु निरामया है  अर्थात सभी प्राणी सुखी हों एवं निरोगी हो। इसके साथ-साथ खेती की विभिन्न प्रकार  की प्रणालीयों को  प्रकृति की व्यवस्था से जोड़ कर प्राकृतिक खेती के रूप में परिवर्तित कर दिया गया । यद्यपि 1993 के दरान इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट को प्राकृतिक फसल सुरक्षा के नाम मैं बदल दिया गया था जो बाद फिर से आईपीएम के नाम से जाना जाने लगा। 

Thursday, March 26, 2026

रासायनिक खेती के दुष्परिणाम

1, फसल उत्पादन लागत का बढ़ जाना। 
2, उत्पादन लगभग स्थिर हो गया ।
3, गांव के युवा बे रोजगार घूम रहे हैं ।
4, किसान कर्जदार हो  गया ।
5, जमीन में जीवांशकर्बन लगभग 0,3 प्रतिशत रह गया है जिस जमीन की उर्वरा शक्ति घट गई । यह कार्बन करीब एक प्रतिशत। होना चाहिए़ ।
6, बायोडायवर्सिटी नष्ट ह गई। बहुत सारेजव जंतु विलुप्त हो गए ।
7, भू जल स्तर नीचे चला गया ।
8, किसानों की आत्महत्या बढ़ गई ।
9, भोजन, पानी, सब्जियां तथा फल, पशुओं का चारा तथा दूध आदि  वीसाक्त हो गए । जिनमैं कीटनाशकों के अवशेष मिलने लगे ।
10, जलाशय खत्म हो गई।
11, भूमि की संरचना खराब हो गई । जमीन बंजर हो गई। 
12, मनो क्रॉपिंग से भोजन सिर्फ 6 फसलों तक ही सीमित रह गया यह फसल है गहूं
 चावल, मक्का,  गन्ना,सोयाबीन, कॉटन।
13 भोजन की पौष्टिकता खत्म हो गई ।
14 जल ,जमीन ,जंगल, जानवर, एवं जन सभी प्रभावित हुए ।
15, विभिन्नपकार की बीमारियां मनुष्य तथा जानवरों म
आनेलगीं ।
16, मनुष्य महार्मोंस डिसऑर्डर  के प्रभाव दिखाईद।
ने लगे ।
17,ज्यादा  उत्पादन के बावजूद फसल उत्पादों का विक्रय मूल्य काम मिल रहा।
18,  1 किलो गेहूं से 900ग्राम दलियlगेहूं की कपनियां अथवा व्यापारी सुखी उनकी हैं उनकी आमदनी किसानों से अधिक है जब की किसान गेहूं के एक दाने से 1 किलो अनाज पैदा करता है। और वह कर्जदार  है और उसे कई बार  आत्महत्या करना पड़ता है  ।
19। क्लाइमेट चेंज अथवा मौसा म मै  बदलाव , ताप क्रम में बढ़ोतरी, सूखा   तथा बाढ़ की समस्या ।
20 नए-नए कीड़े तथा बीमारियों का प्रकोप। 
21, कीटों में नासि जीव नाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना। 
22 विभिन्न नाशि जीव  की संख्या में अचानक वृद्धि हो जना । लाभदायक जीवन की संख्या में कमी आ जाना ।
 23, भूमि में जीवाश्म कार्बन  की मात्रा तथा  सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में कमी आ जाने की  बजय से भूमि की उर्वरा शक्ति मैं कमी आ  गई ।
24,भूमि बंजर हो गई।
25, फसल पारिस्थितिक तंत्र में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के लाभदायक जीव जैसे तितलियां,मेंढक, केंचुआ,स्नैक्स, वेलवेट माइट, गिनजय, विभिन्नपकार
की चिड़ियों ,जुगनू , मधुमक्खियां, भौंरा ,मकड़ियां,आदि विलुप्त हो  गए ।
26 नौजवानों का गांव से shahron.  की तरफ पलायन होने लगा ।
27 , मशीनरी कलर की वजहस बैलों पर आधारित खेती खत्म हो  गई ।
28, रसायन ऑन के उपयोग से पैदा होने वाले कृषिउत्पादों मे रसायनों के अवशेष भारी मात्रामे पाए जाने की बजाय से कृषि उत्पादन विषैले हो  चुके हैं जिनके खाने से मनुष्य तथा पशुओं में विभिन्न प्रकार की लाइलाज बीमारियां  पैदा होने लगी है ।
29 जल ,जमीन, जंगल, जानवर, जैव वविधता,जन, तथा जलवायु बुरी तरह से प्रभावित हुए  हैं।

Saturday, March 21, 2026

खेती एक संपूर्ण योजना तथा तंत्र है Farming is a complete planning and system as per need of nature and society .

                        𝗙𝗮𝗿𝗺𝗶𝗻𝗴
 IPM and Farming  is a complete planning and system of   doing crop  production,protection and it's  ,management right from  production, processing,packaging, Certification,branding and also up to the marketing to make  farming  profession profitable to the Farmers and and favourable for climate ,weather, and nature to avoid adverse  effects of chemicals and wrong agricultural practicess on nature and so ciety.
खेती फसल उत्पादन की फसल उत्पादन से लेकर, प्रोसेसिंग अथवा संस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रमाणीकरण, एवं  मार्केटिंग अथवा विपणन तक की एक संपूर्ण योजना है जो सिर्फ लागत पर आधारित ना होकर प्रकृति के संपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित है ।यह आर्थिक दृष्टिकोण से लाभकारी एवं स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से प्रकृति और समाज के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होनी चहिए। मिश्रित खेती एवं बहुस्तरीय तरीके से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
एक  खेत फसल अनेक, बीज एक उत्पादन अनेक, पौधा एक उत्पादन वर्ष अनेक । अनेक प्रकार के पौधों तथा प्रकृति के साथ सहअस्तित्व, पूरकता, स्थानीयता, एवं समृद्धि के सिद्धांत केसाथ साथ प्रकृति में पाए जाने वाले नियम , नियंत्रण  एवम संतुलन  के सिद्धांत के अनुसार खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
Many crops  in a single field.
More production from a single seed.
Production  up to many years from a single plant.
Coexixtence among nature ,different types of plants. 
Vocal for local.
 Prosperity among the Farmers.
Nature has rule ,control and balance.
Multicropping and production density  iis the need of the hour.






Friday, March 20, 2026

आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती के कुछ मूल मंत्र/, खेती का प्राकृतिक विज्ञान

1 खेती करते समय हमें यहसोचना पड़ेगा की हमे जिंदगी बचाना है या नशिजीवनाशकों को बचना है।
2, रासायनिक नासि जीव नाशक एवं उर्वरक कृषि संस्कृति की परंपरा में कभी भी शामिल नहीं थे।
3,Food security along with food ,socialand ecological safety is the main objective of IPM and Natural Farming.
4, प्राकृतिक खेती सुरक्षित भविष्य और उत्तम स्वास्थ्य का आधार है। 
5,ह्यूमन हेल्थ,प्लांट हेल्थanimal health,and soil health must be considered with a single eyeor all together to implement IPM and Natural farming.
6, खाने योग्य सुरक्षित भोजन के साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण एवं इकोलॉजिकल सुरक्षा अथवा पारिस्थितिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना आईपीएम तथा प्राकृतिक खेती का प्रमुख उद्देश्य है।
7, प्रकृतिक के सिद्धांतों पर विज्ञान को विकसित करें।
8, खेती विरोध करने का विषय नहीं है बल्कि यह समीक्षा करने का विषय है। 
9, खेती भारतीय संस्कृतिकएक सम्मानजनक काम रहा है।
     उत्तम खेती माध्यम बान 
    निकृष्ट चाकरी भिखनिदान
10, पौधोंमे एक दूसरे को पोषण का नियम, पूरकता ही उर्वरकता है, जीवजतु, पशु पक्षियों तथा वनस्पतियों के बीच परस्पर  में संबंध का नियम काम करता है जो खेती  करने मैं  सहायक होता है।
11, खेत एक फसल अनेक 
    बीज एक उत्पादन अनेक  
   पौधा एक उत्पादन वर्ष अनेक 
  हर पौधे में गुणात्मक उत्पादन  ही प्राकृतिक खेती के सिद्धांत हैं।
12, खेती की उर्वरा शक्ति के पोषक रस को खेतोंमे ही बनाया जाए तथा जैव विविधता एवं प्रकृति के ससाधनों तथा जीवन के पंच महाभूत का संरक्षण करें।
13, प्राकृतिक एवं ऑर्गेनिक खेती सह अस्तित्व एवं स्थानीयता के  सिद्धांत पर आधारित है।
14, समृद्धि ही खेती   का मूल मंत्र  है।
15, खेती में बाहरी खाद की आवश्यकता नहींहती है। क्योंकि खेत में खाद बनाने  की समर्थ  होती है। जमीन अपने उर्वरता के आधार पर खाद बनती है।
16, हरित क्रांति में प्रकृतिक को जानकारी दिया गया तथा बाजार आधारित इनपुट्स को वरीयता दी  गई  थी जिससे उत्पादन लागत में वृद्धि हुई ।
17, प्रकृति में नियम भी है, नियंत्रण भी है, और संतुलन भी है। प्राकृतिक खेती में कृत्रिमिता की जगह प्रकट की व्यवस्था को समझें ।
18, सामुदायिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, पारिस्थितिकतत्र, जैववविधता,भूमि, जल अग्नि आकाशसमीरा अथवा वायु  का संरक्षण करते हुए कम से कम खर्चे में, जीवन प्रकृति और समाज को कम से कमबधित करते हुए जब वनस्पति संरक्षण किया जाता हैतभी  हम उसको आईपीएम कहते हैं।
19, आई पी एम नाशीजीव प्रबंधन सहित संपूर्ण कृषि तंत्र अथवा पद्धति का एक समेकित प्रबंधन की विचारधारा है।
20,There is no culture better than Agriculture.
कृषि से उत्तम कोई भी संस्कृति नहीं है।
21, खेतों के अंदर बाहर घूम कर एवं बैठकर देखें, पौधों से बात करें और अपनी खेती के विकास के लिए सोचऐं ।
22, खेती में मानसिकता के बदलाव की जरूरत है। रसायनों के उपयोग को बंद करें तथा प्रकृति और उसकीववस्था के आधार पर खेती करें । बाजार के इनपुट एस को बंद करें। खेती जीवन एवं परिवार का विषय है खेती व्यवहार एवं सहकारिता तथा सहयोग का विषय है।
23 किसानों का एक ही धर्म है वह खेती ।